Monday, September 8, 2008

जीत से आगे की राह से अंजान हैं हमारे चैंपियन

दिल्ली का अंबेडकर स्टेडियम। डूरंड कप का फाइनल मुकाबला शुरु होने को है। देश के सबसे पुराने फुटबॉल टूर्नामेंट में रस्म अदायगी के तौर पर इस बार खिलाड़ियों से रुबरु कराने के लिए मुख्य अतिथि की भूमिका में हैं ओलंपिक पदक विजेता विजेन्द्र सिंह। दो दिन पहले वो एक मनोरंजन चैनल के रिएलिटी शो में इसी हैसियत से मौजूद थे। सुरों के प्रतियोगियों का हौसला बढ़ाने के लिए बीजिंग के किस्सों को सुनाते हुए। विजेन्द्र इस हद तक इस रिएलिटी शो पर हावी थे कि गायक सुखविन्दर सिंह समेत तमाम हस्तियां उनकी आगवानी में उठ खड़ी हुई थीं, और विजेन्द्र को भी यह कार्यक्रम इतना भाया कि उन्होंने भी अपने सुर छेड़ने में संकोच नहीं किया।

ओलंपिक में कायमाबी हासिल करने के बाद विजेन्द्र के लिए यह एक यादगार अनुभव है। विजेन्द्र को मिलते इस सम्मान के बीच मैं लगातार महसूस कर रहा था कि क्रिकेट की सीमा रेखा के बाहर भी एक दुनिया है। उस दुनिया में हासिल मुकाम को भी लोग सलाम करते हैं। याद आ रही थी पिछले शुक्रवार को एक स्पोर्ट्स मार्केटिंग समिट में मेरे एक मित्र की छेड़ी बहस। आखिर हम क्रिकेट के बाहर दूसरे खिलाड़ियों को क्यों ब्रांड नहीं बना पाते। इस बहस में क्रिकेट और बाकी खेल के बीच अप्रोच और सोच एक बड़ी खाई की तरह सामने आती दिखायी दी थी। क्यों हम सचिन, धोनी, सहवाग की तरह विजेन्द्र, सुशील और अभिनव बिंद्रा को एक ब्रांड की तरह पेश नहीं कर पाते। खेल में दिख रहे उनके जीवट को उनकी पहचान में गढ़कर हम उन्हें ब्रांड की तरह पेश कर पाने में क्यों चूक जाते हैं।

इन सबके बीच विजेन्द्र के ये दो लम्हे इस बहस से निकली इस सोच पर चोट कर रहे थे। लेकिन,सोमवार की सुबह अखबार के पन्नों को पलटते हुए एक सामान्य सी खबर ने मेरी इस नयी बनती सोच पर सवाल खड़ा कर दिया। भटिंडा में शुरु हुई राष्ट्रीय मुक्केबाजी की रिपोर्ट मैं हिन्दू में पढ़ रहा था। बीजिंग के बाद नए जोशो- खरोश से भरे माहौल के बीच जारी राष्ट्रीय चैंपियनशिप। बीजिंग में रिंग के बाहर विजेन्द्र,जितेन्द्र और अखिल की हौसलाफसाई करते संधू की वहां मौजूदगी। लेकिन, साथ ही एक बड़ा शून्य। एक खालीपन। ओलंपिक में अपने प्रदर्शन के चलते देश में रिंग में एक नयी अलख जगाने वाले भारत के ये तीनों मुक्केबाज विजेन्द्र,जितेन्द्र और अखिल की गैरमौजूदगी एक कचोट की तरह उभार ले रही है। खासकर ओलंपिक मेडल विजेता विजेन्द्र के बिना रिंग एक खालीपन को लिए आपके सामने खड़ा है।

यहीं, ओलंपिक में गोल्ड हासिल करने वाले अभिनव बिंद्रा का बयान भी बेहद तकलीफ देता है। उनसे पत्रकारों ने पूछा कि अब आपकी क्या योजनाएं हैं। तो उनका जवाब था-“ जहां तक शूटिंग की बात है,फिलहाल मैं बहुत थकान महसूस कर रहा हूं। मुझे अब इससे कुछ दिन अलग हटना होगा। पांच महीने बाद आप मुझे फोन कीजिए तो मैं आपको अपनी योजनाएं बता सकूंगा।”

सवाल ये आखिर कैसे आप इस पेशेवर दौर में अपने खेल से खुद को अलग कर सकते हैं। बेशक, आपका खेल दूसरे खेलों से ज्यादा एकाग्रता की मांग करता है। आपको शारीरिक और मानसिक तौर पर थका देता है,लेकिन जो खेल आपको पहचान दे रहा है, नयी बुलंदियों की ओर ले जा रहा है,उसी से आप दूर होने की कैसे सोच सकते हैं। बेशक, कुछ दिनों या महीने की बात क्यों न हो। ये खेल ही आपकी पहचान है। इसकी जरुरतों के मुताबिक आपको जीना होगा। अगर आप मिसाल बन जाएं तो ये जिम्मेदारी और बढ़ा आयाम ले लेती है।

उसेन बोल्ट, असाफा पॉवेल,रोजर फेडरर और नडाल पर नजर डालिए। अंतरराष्ट्रीय मंच पर बीजिंग से ठीक बाद उसेन बोल्ट तीन गोल्ड मेडल लेने के बाद एक नहीं बल्कि दो-दो ग्रां पी प्रतियोगिताओं में उतर जाते हैं। ठीक वैसे ही शिद्दत और जीवट से उसमें हिस्सेदारी करते हैं। नडाल ओलंपिक मेडल हासिल करने के बाद फेडरर के साथ यू एस ओपन में दिखायी देते हैं। दरअसल, खेलों की पेशेवर दुनिया में अगर पैसा बरसता है, तो वो आपसे इसकी कीमत भी वसूलता है। अगर आप सही मायने में पेशेवर हैं तो इससे मुंह नहीं मोड़ सकते। साल में 365 दिन होते हैं,लेकिन एक पेशेवर खिलाड़ी के लिए हर एक खत्म होते दिन के बाद अगले 365 दिन जुड़ते जाते हैं। आज आठ सितंबर को आप ये नहीं कह सकते कि 2008 में अब बस 114 दिन ही बाकी बचे हैं। यहां अगले 364 दिन आपका इंतजार कर रहे हैं। आधुनिक ओलंपिक के सबसे बड़े नायक की तरह उभार लेने वाले अमेरिका के माइकल फेल्पस पर गौर कीजिए। बीते चार सालों के हर 365 दिन उन्होंने कई-कई घंटे पानी में बिताए हैं।

फिर,मेरा तो ये भी मानना है कि बेशक विजेन्द्र भटिंडा में राष्ट्रीय चैंपियनशिप में खेलने नहीं जाते। लेकिन,उनकी मौजूदगी ही उभरते हुए खिलाड़ियों में एक नया हौसला भर सकती थी। ये कुछ ऐसा ही है कि भारतीय क्रिकेट टीम सचिन तेंदुलकर के मैदान में न होने के बावजूद ड्रेंसिंग रुम में उनकी मौजूदगी को एक प्रेरणा की तरह देखती है। हम क्रिकेटर को ऐसे किसी एक फैसले पर गाहे बगाहे सवालों के घेरे में खड़ा करते रहते हैं। लेकिन,यहां शायद विजेन्द्र के इस फैसले पर किसी की गहरी नज़र नहीं जा रही।

लेकिन,दूसरी ओर पहलवान सुशील कुमार भी हैं। विजेन्द्र की तरह ही उन्होंने भी ओलंपिक में ब्रोन्ज मेडल हासिल किया है। लेकिन, जीत के जश्न के बीच भी वो अखाड़े में उतर चुके हैं। मेरे एक दोस्त से मुलाकात में उनका कहना था –“ एक दिन अगर मैं अखाड़े से दूर रहूं तो तीन दिन पिछड़ जाता हूं। लिहाजा ये जोखिम मैं नहीं ले सकता।” इतना ही नहीं, इसी रविवार को बवाना में वो महाबलि सतपाल की ओर से भारत और पाकिस्तान के पहलवानों के बीच आयोजित सालाना कुश्ती मुकाबलों में शिरकत करने पहुंचे।

दरअसल,सुशील कुमार की यह सोच एक मिसाल की तरह सामने आती है। ब्रांड की उस बहस में उन्हें बाकी खिलाड़ियों से कहीं बहुत आगे खड़ा करती है। आखिर,एक ओलंपिक में 8 गोल्ड मेडल हासिल करने के बाद भी फेल्प्स की भूख शांत नहीं हुई है। बीजिंग खत्म होते ही उनके निशाने पर आने वाला कल है। उनका कहना है कि बीजिंग अब अतीत है,और मैं वर्तमान में जीता हूं। साफ है कि शिखर पर बने रहने से वहां पहुंचना कहीं आसान है। कम से कम इस पेशेवर दौर में वहां से बेदखल होने में देर नहीं लगती। मुझे लगता है कि हमारे खिलाड़ी जीत तक तो पहुंचना तो जान गए हैं, जीत का स्वाद उन्होंने चख लिया है,लेकिन जीत से आगे के रास्ते से ज्यादातर खिलाड़ी अंजान हैं।

1 comment:

rajani kant said...

अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में भारतीय खिलाड़ी पदक से इसी लिए दूर रहते हैं कि उनमें जीत की भूख नहीं होती है। आखिर बचपन से उन्हें संतोषम् परम सुखम् की घुट्टी जो पिलायी जाती है। अगर खिलाड़ी अपनी प्रतिभा या तुक्के से पदक हासिल कर लें तो जीत का हैंगओवर इतना ज्यादा होता है कि खिलाड़ी अपनी कामयाबी को पचा नहीं पाते हैं। एथेंस ओलंपिक के सिल्वर मेडलिस्ट राज्यवर्धन सिंह राठौड़ का बीजिंग ओलंपिक में क्या हाल हुआ ये बताने की जरूरत नहीं है। डर है कि अभिनव, विजेंद्र और सुशील के साथ भी कहीं ऐसा न हो। सुशील को छोड़कर बाकी दोनों खिलाड़ी जिस तरह का बर्ताव कर रहे हैं उससे तो यही लगता है।