Thursday, September 4, 2008

क्रिकेट के विज्ञापनों में बनता देश

(विज्ञापनों की अपनी दुनिया होती है। लेकिन,विज्ञापन बाज़ार का बड़ा हथियार है। नयी दुनिया में विज्ञापनों के अक्स में देश बनता है,उसकी छवियां गढ़ी जाती हैं। आईपीएल शुरु होने से पहले अलग अलग टीमों के विज्ञापन बनाए गए थे,जो अपने आप में अलग कहानी कहते थे। इन्हीं विज्ञापनों के इर्दगिर्द यह लेख लिखा गया था। )

एक साधारण सी बस, बस में एक बूढ़ा शख्स अपनी उम्र के बोझ को तो उठा ही रहा है, एक संदूक के बोझ को भी उठा रहा है। उस बुजुर्ग पर नज़र पड़ते ही सीट पर पहले से बैठा एक नौजवान सिख पूरे सम्मान के साथ बैठने के लिए जगह छोड़ता है। लेकिन, अगले ही पल वो अपना इरादा बदल देता है। संदूक पर चिपके एक स्टीकर पर उभरे शब्द उसके दिल में आए आदर के भाव पर भारी पड़ जाते हैं। वो पूरी तैश में अकड़कर सीट पर बैठ जाता है। सिख नौजवान अबकी बार एक काम और करता है। वह अपनी कलाई में बंधे बैंड को दिखाता है। उम्र के बोझ से दबे उस बुजुर्ग की नज़र उस बैंड पर पड़ती है। अचानक उसका आत्म सम्मान उसकी तमाम परेशानियों पर हावी हो जाता है और बुजुर्ग उस नौजवान को करीब करीब चिढ़ाते हुए आगे बढ़ जाता है।

ये दृश्य एक विज्ञापन का है। आजकल 24 घंटे में टेलीविजन स्क्रीन पर कई बार उभरता है। कहीं जयपुर की राजस्थान रॉयल्स और मोहाली की पंजाब किंग्स के बीच प्रतिद्वंदिता की शक्ल में तो कहीं मुंबई इलेविन और दिल्ली के डेयर डेविल्स के बीच दुश्मनी की शक्ल में यह विज्ञापन लोगों की आंखों पर कई बार दस्तक देता है । यह क्रिकेट के बाजार का नया दौर और विज्ञापन इस दौड़ की नुमाइंदगी कर रहा है।
क्रिकेट के नए दौड़ में टीमों के प्रति नहीं, शहरों के प्रति वफादारी की होड़ लगी है। क्रिकेट के इस नए बनते बाजार में क्रिकेट हाशिए पर है। विज्ञापन कहीं क्रिकेट का बिंब नहीं पकड़ते। वे शहरों के प्रति वफादारी की मशाल जगाने की कोशिश में हैं। इस उम्मीद में कि आईपीएल के इस बाजार में कामयाबी की एक नयी इबारत लिखी जा सके।

लेकिन, यहीं आप एक विरोधाभास से रुबरु होते हैं। विरोधाभास यह कि पंजाब का सबसे बड़ा चेहरा हरभजन सिंह पंजाब किंग्स के लिए नहीं मुंबई इलेविन के लिए अपनी वफादारी निभाएगा। दिल्ली की सबसे उभरती तस्वीर ईशांत शर्मा दिल्ली डेयरडेविल्स के लिए नहीं बल्कि शाहरुख की कोलकाता नाइट राइडर्स के लिए जौहर दिखाएगा। रोहित शर्मा मुंबई के हैं,लेकिन उनका बल्ला मुंबई इलेविन के स्ट्रोक्स की झड़ी नहीं लगाएगा बल्कि वह चारमीनार के लिए मशहूर शहर हैदराबाद के डेक्कन चार्जर्स के लिए ताबड़तोड़ खेल खेलेगा। ये फेहरिस्त सिर्फ तीन नामों तक सीमित नहीं है। इसमें बीसियों खिलाड़ी हैं,जो अपने महानगरों की टीमों के लिए नहीं बल्कि दूसरे शहरों की तरफ से मैदान में उतरेंगे। आखिर, इन दूसरे शहरों के नाम पर भारी बोली लगाकर इन खिलाड़ियों को कुछ दौलत के बाजीगरों ने खरीदा जो है।

लेकिन, इस पहलू को अगर थोड़ा ठहरकर टटोलें तो इसमें कोई हैरत नहीं होनी चाहिए । महानगरों के ढांचे और उसकी बुनावट के बीच क्रिकेटरों की ये छवियां बेहद सहज दिखती है। दरअसल, शहरों का इतिहास पुराना हो सकता है लेकिन औद्योगीकरण के बाद महानगरों में तब्दील हुए शहरों में देश के हर कोने से लोग आए। बदलते वक्त में उनकी तादाद वहां के मूल निवासियों पर भी भारी पड़ गई। आज मुंबई में मराठियों की संख्या 50 फीसदी से ज्यादा नहीं है। महानगर आज कॉस्मोपॉलिटन क्लचर के प्रतीक हैं। बाजार भी इसी कॉस्मोपॉलिटन कल्चर को बढ़ावा देते रहे हैं। इसी कड़ी में फिल्मों से लेकर हर क्षेत्र में महानगरों के नए बिंब गढ़ दिए गए हैं। आकाश चूमती इमारतों के बीच चौराहों पर खड़ी लालबत्तियों के पास ठहरा ट्रैफिक सभी महानगरों की पहचान से जुड़ गया है। चौराहे की लाल बत्ती उस अमूर्त नियम कायदे की प्रतीक है जो आदमी की पहचान उसके कुल गोत्र और भाषा –प्रांत से नहीं बल्कि बतौर नागरिक करती है। हर नागरिक को एक ही कायदे में बांधती है ।लेकिन,बात इतनी भर नहीं । महानगर एक तरफ पुरानी पहचान को मिटाने की कोशिश करता है तो एक नई पहचान को उभारने का भी। पहचान एकसार होती है कुछ खास चीजों से । सभी महानगरों ने फिर अपना अपना एक प्रतीक ढूंढा है। लोकल ट्रेन मुंबई के हर बाशिंदे को जगह देती चलती है। मेट्रो दिल्ली की नयी पहचान है। 21 वीं सदी की इस भागदौड़ में भी कोलकाता की सड़कों पर चलने वाली ट्राम का ठहराव अखरता नहीं है।
शायद, इसलिए आईपीएल ने भी अपने अपने शहरों की पहचान के लिए एक आइकन खिलाड़ी भी रखा। सचिन तेंदुलकर मुंबई, सहवाग दिल्ली,गांगुली कोलकाता, युवराज मोहाली और द्रविड बंगलोर के प्रतीक चिन्ह की तरह अपनी टीमों के साथ खड़े हैं। बाज़ार इन्हीं आइकन खिलाड़ियों और धुआंधार विज्ञापनों के जरिए लोगों की संवेदनाओं को छूने की कोशिश में हैं, उन्हें उनके शहर के लिए लॉयल बनाने की कोशिश में है। ये बाजार के लिए चुनौती है,पर खिलाड़ी सहज भाव से बाजार के साथ जुड़े हैं। दरअसल, खिलाड़ियों को सीधा मतलब खेल और खेल से मिलने वाले पैसे से है,और वे इसी भाव में बाजार केंद्रित इस प्रक्रिया का सहज हिस्सा बन चुके है।उन्हें विज्ञापन अपनी तरह से गढ़ता है तो गढ़े।

ऊपर जिस विज्ञापन का जिक्र किया गया वह आम आदमी के भीतर छुपे एक खास भाव को उभारता है। ये विज्ञापन कहता है कि आदमी कहीं भी हो उसके मन में एक खास महानगर मौजूद होता है। सिर्फ मौजूद ही नहीं, महानगर का भाव इतना गहरा होता है कि आदमी का आदमी से तात्कालिक रिश्ता भी इसी भाव से तय होता है । विज्ञापन साफ कह रहा है मैं जिस महानगर का वफादार हूं उसके वफादार तुम नहीं तो हमारा तुम्हारा आपसदारी का तकाजा खत्म। क्रिकेट की बदलती दुनिया अपने विज्ञापनों में देश को खास तरह से रच रही है। पहले हिन्दुस्तान गांव में बसता था लेकिन 20-20 वाले धुआंधार दौड़ में आया यह विज्ञापन कह रहा है कि देश महानगरों में बस रहा है।

3 comments:

abhishek said...

जब भी आपका आर्टिकल पढ़ता हूं, दिल से एक ही आवाज निकलती है, अ ग्रेट सैल्यूट टू यू सर। आकाश चूमती इमारतों के बीच चौराहों पर खड़ी लालबत्तियों के पास ठहरा ट्रैफिक सभी महानगरों की पहचान से जुड़ गया है। आपकी यह लाइने पढ़कर आपको पढ़ने वाले के यह अहसास हो जाता है कि यह लेख एनपी सर की कलम से निकला है। खालिश क्रिकेट को भावों से जोडंने की महारत आपको शब्दों को अद्भुत बनाती है।

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया लेखन. पढ़कर आनन्द आया.

diery said...

sanjay srivastava
सबसे बडी और ख़ास बात यही है की आप जो विषयवस्तु लेते हैं, उसकी आत्मा को सामने ले आते हैं और उसके साथ जीते हुए लगते हैं. लगता है कि पाठक के सामने पूरी की पूरी फ़िल्म चल रही है. और वो शिद्दत इसे feel कर रहा है.
संजय srivastava