Thursday, September 18, 2008

आइए, हॉकी का शोकगीत लिखें


1975। क्वालालम्पुर वर्ल्ड कप हॉकी। 33 साल बाद भी वो दिन फ्लैशबैक की तरह निगाहों के सामने गुजर जाते हैं। मार्च का महीना ! ऑलइंडिया रेडियो पर आती कमेंट्री से सटे कान। मलेशिया के खिलाफ सेमीफाइनल के मुकाबले से सिर्फ आठ मिनट पहले माइकल किंडो की जगह मैदान पर उतरते असलम शेर खान। ताबीज चूम भारत को पेनाल्टी कॉर्नर पर गोल जमाकर बराबरी पर लाते असलम। एक्स्ट्रा टाइम में फिलिप्स के दाहिनें फ्लैंग से मिले क्रॉस पर हरचरण का विजयी गोल। भारत पहली बार वर्ल्ड कप के फाइनल में। फाइनल में पाकिस्तान की शुरुआती बढ़त। इस्लाउद्दीन के पास पर जाहिद का गोल। सुरजीत सिंह का पेनाल्टी कॉर्नर पर बराबरी दिलाना। अशोक कुमार का विवादों से भरा विजयी गोल। शिखर पर काबिज होती भारतीय हॉकी। जश्न में डूबता पूरा देश। सर आंखों पर खिलाड़ियों को नवाजता देश। एक एक लम्हा मेरी यादों में, मेरी कल्पनाओं के हस्ताक्षर के साथ जस का तस मौजूद है। आज भी याद करता हूं तो रोमांच में एक बारगी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

1976। मॉट्रियल ओलंपिक। शिखर से ओझल होती भारतीय हॉकी। लीग में होलैंड से एक के मुकाबले तीन गोल से शिकस्त। आस्ट्रेलिया के हाथों एक-छह की करारी हार। वर्ल्ड चैंपियन भारत सेमीफाइनल तो दूर, गिरते गिरते सातवें पायदान पर जा ठहरा। इस कदर शर्मनाक प्रदर्शन कि स्टेट्समैन के पूर्व खेल संपादक और हॉकी को शिद्दत से जीने वाले के एन मौलाजी के शब्द थे-मॉट्रियल के इस हॉकी स्टेडियम में हम शर्म में इतना डूब चुके हैं कि अपनी कमीजों में भी इसे ढाक नहीं सकते।

महज एक साल में ये भारतीय हॉकी के दो छोर हैं। क्वालालम्पुर और मॉट्रियाल। एक ही टीम मैदान पर उतरी। अजीत पाल, अशोक कुमार, बीरेन्दर सिंह, फिलिप्स, हरचरण। करीब करीब एक से चेहरे। लेकिन, एक शिखर पर काबिज हुई तो दूसरी रसातल की ओर जा मुड़ी। मेरे लिए भारतीय हॉकी की जीवंत कहानी इस एक साल में ही शुरु हुई और इसी एक साल में खत्म हो गई। इस हद तक कि जीत का बड़े से बड़ा लम्हा 1975 के शिखर पर भारी पड़ नहीं सका। बड़ी से बड़ी शिकस्त मॉट्रियल के सामने ढांढस बंधाती दिखी। भारत 1998 में एशियाई चैंपियन बना तो 1982 के दिल्ली एशियाड़ में पाकिस्तान के हाथों अब तक की सबसे बड़ी शिकस्त से रुबरु हुआ। एक ऐसी शिकस्त,जिसे आधार बनाकर बॉलीवुड के पर्दे पर चक दे इंडिया की कहानी ने जन्म लिया। लेकिन,मेरे लिए ये जीत और ये हार 1975 के शिखर और 1976 के पतन के सामने कहीं नहीं ठहरती। आज महसूस करता हूं तो लगता है कि भारतीय हॉकी का आगाज और अंत शायद एक साल के दौरान ही तय हो गया।

लेकिन, इस सबके बीच एक उम्मीद जरुर परवान चढ़ती रही। एक बार बिलकुल नयी शुरुआत होगी तो भारतीय हॉकी फिर शिखर की ओर मुखातिब होगी। ओलंपिक में हॉकी के 100 साल पूरे होने के मौके पर आठ बार की ओलंपिक चैंपियन भारतीय टीम पहली बार क्वालिफाई करने में नाकाम रही। एक बारगी महसूस हुआ कि इस राष्ट्रीय खेल को लेकर बना शून्य आखिरकार विस्तार ले गया। लेकिन, कहीं अवचेतन में जरुर था कि ऐसा आज नहीं तो कल होना ही था। भारतीय हॉकी जिस ढर्रे पर चल रही थी,वहां से आगे का रास्ता दिखायी नहीं दे रहा था। वो सुनहरे कल के बोझ को लेकर जी रही थी। जबकि,बाकी दुनिया बहुत तेजी से आगे निकल चुकी थी। इन सबके बीच,बीजिंग की दौड़ से बाहर होते ही एक नयी शुरुआत का मौका सामने था। अपने बीते कल को भुलाकर,अपने अहम को किनारे रख राष्ट्रीय खेल के सम्मान को लौटा लाने का ख्वाब शक्ल लेने लगा था।

लेकिन,शायद हम अभी भी सीखने को तैयार नहीं हैं। आधुनिक हॉकी के सबसे बड़े लेजेंड रिक चार्ल्सवर्थ को बेइज्जत कर हम वापस भेज देते हैं। इस मौके पर एकजुट होकर नए सिरे से इस खेल की एक एक ईंट को कायदे से रखने की जरुरत है, लेकिन हम हर एक ईंट को ही तार तार करने में जुटे हैं। कल तक एक आईएचएफ भारतीय हॉकी की रहनुमा थी। आज भारतीय हॉकी तीन तीन दिशाओं में घूम रही है। डेढ़ दशक तक केपीएस गिल भारतीय हॉकी की दशा भी ऐसे ही दुरुस्त करने में जुटे रहे, जैसे कभी पंजाब में आतंकवाद की समस्या को दुरुस्त किया था। आलम ये है कि आज बाहर बैठकर भी उनका भ्रम टूटा नहीं है। दूसरी रहनुमाई बंगाल हॉकी एसोसिएशन की ओर से हो रही है। तीसरी रहनुमाई कर रही है एडहॉक कमेटी की ओर से बनी चयनसमिति। ये संयोग ही है कि इस चयन समिति में सत्तर के दशक के हीरो और विलेन मौजूद हैं। चार बार के ओलंपियन और पूर्व कप्तान दिलीप टिर्की को टीम से बाहर बैठाकर चयनकर्ताओं के अंदाज को देखिए- “टिर्की के लिए वापसी के मौके खत्म नहीं हुए हैं।“ लेकिन,क्या कोई इस सवाल का जवाब देगा कि वापसी का मंच है कहां। गिल के दौर में राष्ट्रीय चैंपियनशिप गुजरे कल मे तब्दील हो चुकी है। टिर्की को कहां और कैसे साबित करना होगा,कोई नहीं जानता। नाजुक मौकों पर बाकी दुनिया अनुभव के सहारे बेहतर कल की राह तैयार करती है। लेकिन,हम इससे बेपरवाह दीपक ठाकुर जैसे स्ट्राइकर, विमल लाकरा और विनय जैसे मिड फील्डर के अनुभव को ठेंगा दिखाते हैं। लेकिन,अफसोस सिर्फ यह नहीं है। मीडिया भी सिर्फ खबर तक सिमटकर रह गया है। हॉकी में उसे खबर के पीछे की खबर तलाशने की उसे जरुरत नहीं होती। शायद,हॉकी अब खबर रही भी नहीं।

शायद भारतीय हॉकी अभी तक शून्य पर नहीं पहुंची है। शायद,क्वालीफाई करने से चूकना हमारी हॉकी का शून्य नहीं था। वो हमारा भ्रम था। शून्य होता,तो हॉकी समीक्षक इस लम्हे की चीर फाड़ कर सभी को कड़वे सच से रुबरु कराते। हॉकी के चाहने वाले नायकों पर अपना गुस्सा जाहिर करते। लेकिन,शायद न तो इस हॉकी का कोई नायक था,और न ही नाकामी से कोई आक्रोश उपजा। अगर एक दौड़ता बच्चा गिर जाए तो उसके मां बाप उसे हौसला देकर उठकर आगे बढ़ने को कहते हैं लेकिन यहां ऐसी हौसलाफसाई की उम्मीद करना भी बेमानी है।

तो पहले हमें शून्य पर पहुंचने का इंतजार करना होगा। यानी अभी और नीचे जाना होगा। शायद,इसी सूरत में हम एक नयी शुरुआत की ओर बढ़ सकते हैं। तो चलो हम सब मिलकर इस शून्य का इंतजार करते हैं। तब तक दद्दा ध्यानचंद,बलबीर सिंह,क्लाडियस के किस्सों से भरपूर इस खेल के शोकगीत की तैयारी की जाए। एक अरब की आबादी के इस देश को कभी बाकी दुनिया में शुरुआती सम्मान दिलाने वाले राष्ट्रीय खेल का इतना हक तो बनता ही है।

2 comments:

संजय तिवारी said...

पहली बार किसी खेल ब्लागर को पढ़ रहा हूं. अच्छा लगा.

chandan said...

ऐसा क्या हुआ था क्वालालम्पुर और मांट्रियल के बीच 75-76 के छोटे से अंतराल में..क्या हॉकी खेलने के नियम अचानक बदल गए और हिन्दुस्तानी खिलाड़ियों पर भारी पड़े..क्या कोई नई तकनीक अपना ली गई और हमारी विश्वविजेता टीम इससे वंचित रही..अगर खुद हॉकी के खेल में ऐसी कुछ बुनियादी उठा-पटक नहीं हुई तो हॉकी में हिन्दुस्तान की उस ऐतिहासिक हार का कारण सिर्फ दगाबाज किस्मत के जुमले में ढूंढा जा सकता है या फिर खेल के अपने स्वभाव यानी अनिश्चितता में...लेकिन निश्चितता का तर्क तो क्रिकेट के लिए इस्तेमाल किया जाता है..हॉकी और फुटबॉल अनिश्चितता से उलट खेलने वाली टीमों के परिणामों में निरंतरता के लिए जाने जाते हैं..जाहिर है,हॉकी की उस ऐतिहासिक हार के कारण अपने खेल में ही खोजने होंगे..और उस ऐतिहासिक हार के बाद हम हॉकी में शिखर का सफर दोबारा नहीं कर पाए तो उसके कारण अपने समाज में खोजने होंगे..आज हॉकी की फिक्र किसको है..हॉकी को मध्यवर्ग ने सिरे से खारिज कर दिया है..लालची मध्यवर्ग को ताबड़तोड़ हीरो चाहिए..अपने खोखले अहं की पुष्टि के लिए..दस साल के इंतजार के बाद विश्वविजयी क्रिकेट टीम से हीरो मिल गए तो मध्यवर्ग ने हॉकी को अपने सपनों के भारत के मानचित्र से बाहर फेंक दिया..हॉकी हो या फिर कोई और खेल जिसके लिए मध्यवर्ग सोचना बंद कर देगा..उस खेल का हश्र हॉकी जैसा ही होगा..
हॉकी की गौरवगाथा में पतन के निर्णायक बिन्दु को रेखांकित करने वाले इस लेख और उतने ही सटीक शीर्षक के लिए लेखक की कलम को मुबारकबाद.
चंदन श्रीवास्तव