Tuesday, September 9, 2008

सौरव को मिलेगा उस विराट लम्हे को जीने का मौका ?

14 साल पहले अक्टूबर का महीना। दीपावली के दिनों में वेस्टइंडीज की टीम भारत के दौरे पर थी। मैं भी बाकी पत्रकार मित्रों की तरह इसकी कवरेज के लिए एक शहर से दूसरे शहर की दूरी पाट रहा था। इसी कड़ी में एक सांझ मैं दिल्ली के फिरोजशाह कोटला पर अगले दिन होने वाले मुकाबले की रिपोर्ट भेजने में जुटा था। अचानक एक पत्रकार मित्र ने कहा- “कपिल रिटायरमेंट ले रहे हैं।” कुछ देर के लिए मैं सन्न रह गया। पल भर में ये खबर पूरे मीडिया में फैल गई। इससे पहले आप कुछ टटोलें, पता चला कि कपिल ने आनन-फानन में पांच-सात पत्रकारों को एक फाइव स्टार होटल में बुलाकर अपने रिटायरमेंट का ऐलान कर दिया है।

ये खबर झकझोरने वाली थी। इसलिए नहीं कि कपिल के इस फैसले से अजहरुद्दीन की उस भारतीय टीम में एक बड़ा शून्य उभर रहा था। वो तो पिछले एक साल से अपने करियर की संध्या में थे। कुछ दिन पहले ही फरीदाबाद के नाहर सिंह स्टेडियम में फिल सिमंस के बल्ले से निकलते हर स्ट्रोक ने कपिल की टीम में मौजूदगी पर सवाल खड़े कर दिए थे। लेकिन, कपिल का क्रिकेट से अलग हटना एक बड़े सवाल की तरह मेरे सामने खड़ा था। कपिल सिर्फ क्रिकेटर भर नहीं थे। कपिल एक बदलाव के प्रतीक थे। इस कपिल देव की इतनी सूनी विदाई नहीं हो सकती।

कपिल से ठीक उलट एक दूसरे छोर पर सुनील मनोहर गावस्कर खड़े दिख रहे हैं। 1987 में बेंगलोर में गावस्कर अपने सुनहरे टेस्ट करियर को अलविदा करने की सोच के साथ ही मैदान में उतरे। जेहन में बीते 17 साल के हर उस लम्हे की याद संजोए, जहां तमाम उतार-चढ़ाव के बीच उनका करियर परवान चढ़ता रहा। इस गावस्कर ने यहां पाकिस्तान के खिलाफ अपने आखिरी टेस्ट में करियर की सबसे यादगार पारी खेली। लगातार टूटती विकेट पर इकबाल कासिम और तौसिफ अहमद के खिलाफ चौथी पारी में करीब साढे पांच घंटे तक एक छोर को थामे गावस्कर खड़े रहे । दुनिया में तेज़ गेंदबाजों के खिलाफ सर्वकालीन महान सलामी बल्लेबाजों में एक गावस्कर की बेहद मुश्किल विकेट पर स्पिन के खिलाफ यह 96 रनों की एक बेजोड़ पारी थी। पारी की शुरुआत करने आए गावस्कर जब आठवें बल्लेबाज के तौर पर पैवेलियन लौटे तो, पूरे चेन्नास्वामी स्टेडियम में गावस्‍कर की पारी लोगों के जेहन पर हावी हो चुकी थी। भारत की हार-जीत से भी आगे। ड्रेसिंग रुम में ओझल होते सुनील गावस्कर का लेजेंड आज भी अपनी जगह बना हुआ है। यही महानायक की खूबसूरती है। अपने ईर्द-गिर्द बुने तिलिस्म को वो ताउम्र आपके जेहन में छोड़कर चला जाता है।

ये दो महानायकों के क्रिकेट को अलविदा कहने की दास्तां है। ये साफ करते हुए कि जिस खेल ने आपको महानायक के पायदान पर ला खड़ा किया, उस खेल से अलग होने के लिए सिर्फ एक ही मंच है। आप सिर्फ और सिर्फ खेल के मैदान से ही अलविदा कह सकते हैं। पांच सितारा होटल के बंद कमरे में बैठकर आप आखिरी सलाम नहीं कर सकते। आपको अपने उन चाहने वालों के बीच से ही ड्रेसिंग रुम में आखिरी कदम रखना है, जिन्होंने आपको महानायक के पायदान पर काबिज किया। आपको सिर्फ अपने लम्हे को पकड़ना है। शायद, कपिल यहां चूक गए। लेकिन, सुनील गावस्कर ने इस लन्हे की विराटता को पूरी शिद्दत से जीया।

इन दो महानायकों के बीच मेरे जहन में एक और महानायक उभार ले रहा है। सौरव चंडीदास गांगुली। सौरव भी अपने इस लम्हे को पकड़ रहे हैं। इसकी विराटता को मसहूस कर रहे हैं। सौरव गांगुली का कहना है “खेल को अलविदा तभी कहा जाना चाहिए, जब आप अपने खेल के शिखर पर हों, और मैं भी वहीं से अलविदा कहना चाहता हूं।” उनका यह भरोसा तब है, जब कुछ घंटों पहले ही उन्हें विदाई की कहानियां लिखी जानी शुरु हो गई हैं। ये शब्द भले ही उनकी वापसी न करा पाएं, लेकिन ये एक ऐसी सोच को जाहिर करते हैं, जो सौरव गांगुली को क्रिकेटरों की भीड़ में बाकी खिलाड़ियों से अलग खड़ा करती है। कभी हार न मानने वाले सौरव गांगुली।

इस सौरव की शख्सियत अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उनके बल्ले से निकले 21 हजार रनों में नहीं पढ़ी जा सकती। सौरव की पहचान एक बल्लेबाज और खिलाड़ी के दायरे से बाहर एक कप्तान और उसकी सोच से जुड़ी है। मैच फिक्सिंग के बाद लड़खड़ाती भारतीय क्रिकेट का संबल बनते सौरव। नए खून को मौका देते सौरव। लॉर्ड्स की बालकनी मे नंगे बदन लहराती टी-शर्ट्स से जीत के जज्बे को बयां करते सौरव। ईडन की भरी दोपहरी में अपने कमर में पैराशूट बांध अपनी वापसी की जी-तोड़ कोशिश करते, फीनिक्स की शक्ल लेते सौरव।

ऐसे सौरव की सूनी विदाई शायद कोई नहीं देखना चाहेगा। बेशक, उनकी बुढ़ाती टांगों ने आज विकेटों के बीच उनकी रफ्तार को पहले से कम कर दिया हो। बेशक, उनकी फील्डिंग पर आलोचकों ने निगाह गड़ा दी हों। लेकिन, इसके बावजूद सौरव एक सम्मान के हकदार हैं। एक यादगार विदाई के। अगर सौरव अपने खेल के जरिए एक बार फिर वापसी करने में कामयाब हो जाएं, और उसी शिखर से अलविदा लें, जिसकी वो बात कर रहे हैं, तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता। लेकिन, अगर ये भी मुमकिन न भी हो तो भी उनके लिए ऐसी विदाई का रास्ता चयनकर्ताओं को ढूंढना चाहिए। इसकी मिसाल खोजने की कोशिश करेंगे तो उन्हें सरहद पार खड़े इंजमाम-उल-हक नज़र आएंगे। बागी क्रिकेट लीग के तौर पर चर्चित आईसीएल में हिस्सा लेने के बावजूद पाकिस्तानी क्रिकेट बोर्ड ने उन्हें ठीक मैदान से विदाई लेने का मौका दिया। पिछले एक दशक में पाकिस्तान के सबसे बड़े बल्लेबाज इंजमाम लाहौर टेस्ट में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ मैदान में उतरे। उन्होंने पूरे सम्मान के साथ अपने साथियों के बीच अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के आखिरी लम्हों को पूरी शिद्दत से जीया। हर पल ये महसूस करते हुए कि इसके बाद अपनी इस चहेती स्टेज पर वो अब नहीं लौटेंगे। ये भी एक चैंपियन की विदाई की दास्तां है। तो क्या भारतीय बोर्ड सौरव गांगुली को भी ऐसा ही मौका देगा?

2 comments:

Satyendra Prasad Srivastava said...

क्या सौरव और सचिन कपिल और गावस्कर जैसी मिसाल दे पाएंगे? मुझे तो शक है। शरीर भले ही जवाब दे रहा हो लेकिन मैदान का मोह इन्हें नहीं छोड़ रहा है

diery said...

sanjay srivastava said
बेशक महान खिलाडी को वो लम्हा हासिल होना चाहिए कि वो मैदान मे चहेतों के बीच अपने उस खेल को अलविदा कह सके, जिसने उसे शिखर पर पहुंचने का मौका दिया. सौरव गांगुली को भी वो मौका दिया जाना चाहिए. एक कप्तान और एक क्रिकेटर के तौर पर सौरव ने देश को, खेल को एक नही बल्कि कई ऐसे लम्हे दिए, जिन पर हर किसी को गर्व हो सकता है. सौरव ही हैं जिनकी कप्तानी मे टीम इंडिया को नया आत्मविश्वास मिला. लेकिन मुझको लगता है, पिछले एक-दो सालों से उन्हें ससम्मान अलविदा कहने के कई लम्हे मिले थे,...ना जाने क्यों सौरव समय की नजाकत को नही पहचान पाये...
sanjay srivastava