Saturday, September 13, 2008

"......बस ऐसा ही होता है"

इयान हाइबेल। ये नाम आपके लिए जितना अंजाना है, मेरे लिए भी कुछ घंटे पहले उतना ही अंजाना था। लेकिन,मेरे एक मित्र ने इकनॉमिस्ट के ताजा अंक में छपे एक लेख को पढ़ने के लिए भेजा, तो इस शख्स को लेकर मेरी खोज अभी तक जारी है।

इयान हाइबेल। दुनिया के मशहूर टूरिस्ट साइकिलस्ट। साइकिल के पैडल घुमाते घुमाते इस शख्स ने दुनिया को एक नहीं,दसियों बार नाप डाला। पिछले चालीस साल के दौरान इस शख्स ने हर साल औसतन छह हजार मील का फासला तय किया। यानी इन चार दशक के दौरान यह शख्स करीब ढाई लाख मील की दूरी साइकिल के जरिए पार कर गया। आप हिसाब लगाने बैठ जाएं तो ये फासला धरती से चांद की दूरी को पूरा कर डालता है।

इस दौरान इंग्लैंड के इस साइकिलस्ट ने अमेरिकी महाद्वीप के एक छोर से दूसरे छोर को छुआ तो 2006 में 72 साल की उम्र में उत्तर से दक्षिण चीन को नाप डाला। दो पहियों पर चलते चलते वो अमेज़न के घने जंगलों से गुजरा। हौसलों को तोड़ने वाले रेगिस्तान से भी निकला और इंडोनेशिया के अंजान टापुओं तक उसने पढ़ाव खोज लिए। अपनी इस राह में करीब अस्सी पौंड वजनी सामान को साइकिल पर लाद कभी वह तीन तीन फीट गहरे कीचड़ से निकला तो कभी रेत में धंसी साइकिल को खींचता हुआ आगे बढ़ा।

कभी घने जंगलों के बीच हाथियों के झुंड ने उसका पीछा किया,कभी शेर ने उसे महज सूंघकर जान बख्श दी,कभी चीटियों और कीड़ों ने रातों रात उसका पूरा टैंट बर्बाद कर दिया तो कभी लुटेरों का वह आसान निशाना बना। लेकिन, अंजान देश, अंजान राह और अंजान भाषियों के बीच उसके लिए मददगार भी तैयार थे।


मुश्किल हालात में कभी चीन में किसान आगे आए,तो अमेजनिया में इंडियंस ने उन्हें जंगल से बाहर निकलने की राह दिखायी और रेगिस्तान में बच्चों ने खजूर और चाय पिलाकर मौत से लड़ते इयान को नयी जिंदगी दी। हां,हालात कैसे भी हों,वो अपनी साइकिल को बचाने में हमेशा कामयाब हुए। लेकिन, इन उबड़ खाबड़ और मुश्किल रास्तों से ज्यादा भारी पड़ा सपाट रोड का तेज भागता ट्रैफिक। 23 अगस्त ग्रीस में एथेंस और सोलोनिका के बीच दो कारों की रेस के दौरान एक कार ने उनके इस सफर को हमेशा के लिए थाम दिया।

ये सफर 1963 में शुरु हुआ था। अपने दफ्तर से दो साल की छुट्टी लेकर उन्होंने अपने साइकिल पर पहली बार एक अंजान मंजिल की ओर कदम बढ़ाए थे। लौटे तो दस साल बाद। लेकिन, ठहरने के लिए नहीं-इसे एक सिलसिले में तब्दील करने के लिए। सिलसिला,जो एक पखवाड़े तक जारी था। वो लगातार साइकिल चलाते रहे। अकेले। सिर्फ अकेले, अंजान मंजिलों की ओर बढ़ते हुए।

इस सफर ने उन्हें दिए ऐसे अनुभव, जिसे उन्होंने किताबों की शक्ल दी और यूनिवर्सिटी में लेक्चर के रुप में छात्रों के साथ बांटा। लेकिन,एक सवाल का जवाब उनके पास भी नहीं था। आखिर,वो क्यों साइकिल के इन दो पहियों पर अंजान मंजिलों की ओर निकल जाते हैं। एक बार नहीं बार बार। हम और आप भी यही जानना चाहते हैं। उनका बस इतना ही कहना था- “पक्षी उड़ान भरता है,जब उसे कोई जगह आकर्षित करती है। अगर आप उससे इसका जवाब पूछें, तो इसका कोई जवाब नहीं है। बस, ऐसा ही होता है............” इयान हाइबेल भी एक पक्षी की तरह एक जगह से दूसरे जगह साइकिल पर उडान भरते रहे।

3 comments:

Abhishek said...

फॉरेस्ट गंप के साइकिल रूपांतरण

diery said...

sanjay srivastava said
कितने लोग होंगे जो जिंदगी के बंधे-बंधाये फ्रेम को तोड़कर वो सब कर पाते होंगे जो इयान हाइबेल ने किया. साइकिल से पूरी दुनिया को नापना-वो भी एक एक-दो बार नही बल्कि सात बार...इसे ही कहेंगे जिंदगी के मैदान पर हर रोमांच को खेल बना कर जीना. हर चुनौती के सामने दिलेरी का जोश...कल की कोई फ़िक्र नही...हर कदम पर जिंदगी का पूरा कश..काश दुनिया में कुछ और ऐसे हाइबेल पैदा हो गये होते तो ये दुनिया कुछ और ही होती...इससे पहले मैंने हाइबेल का नाम तक नहीं सुना था. अब मुझे इंतज़ार रहेगा कि आप ऐसे और चरित्रों को सामने लायें...और इतने ही गहरे डूबकर उनकी जिंदगी के किस्से को बयाँ करें.
sanjay srivastava

chandan said...

अगर साइकिल को सोच लें तो इयान आईबेल के सफर को सोचना और उनकी अनवरत यात्रा की गुत्थी को सुलझाना मुश्किल नहीं..साइकिल कोई मशीन नहीं है-साइकिल एक औजार है। यहां जानबूझकर दो पारिभाषिक शब्दों का इस्तेमाल करना पड़ा..औजार इशारा करता है उस वक्त को जब सभ्यता औद्योगीकृत नहीं हुई थी..मशीन से इशारे औद्योगीकृत सभ्यता के होते हैं..बात को जरा और सीधे-सपाट ढंग से कहें तो साइकिल अपनी बनावट में आदमी के पांवों का सबसे नजदीकी पड़ोसी है..जो काम ठठेरा अपने हथौड़े से लेता है..लुहार अपनी धौंकनी से वही काम सवार साइकिल और उसके पैडल से लेता है..साइकिल मनुष्य की मेहनत को सबसे कारगर और प्रत्यक्ष ढंग से साकार करती है..मशीन के साथ ऐसा नहीं होता..मशीन आदमी की मेहनत को अबूझ पहेली बना देती है..आदमी उसका संचालक नहीं रह जाता..दौर तो ऐसा आ गया है कि मशीनें ही मनुष्य को संचालित करने लगी हैं..टीवी के लिए काम करते हुए आपने इस बात को बड़े करीब से महसूस किया होगा..मशीन और औजार के इस अंतर को हम यहां इयान पर लागू करें तो हमें दो जीवन दृष्टियों का अंतर साफ साफ नजर आएगा..ज्यादा दिन नहीं हुए जब एक अमेरिकी सौदागर रुस के व्यावसिक यान से अंतरिक्ष की यात्रा पर गया था..लौटने के बाद उसके चेहरे पर अचंभे का भाव नहीं था..उसका चेहरा कह रहा था--वो बाकी लोगों से दो गज ऊपर उठ गया..कुछ हमारे यहां के उद्योगपति भी अपने हवाई जहाज पर दुनिया का चक्कर लगाने का शौक पालते हैं..अंतर इसी बिन्दु पर स्पष्ट होता है..मशीन दुनिया को जीतने का बोध देती है..उसकी हर प्रेरणा दुनिया पर कब्जा करने की प्रेरणा है..कर लो दुनिया मुठ्ठी में के विज्ञापन यों ही नहीं बन और स्वीकार कर लिए जाते..औजार दुनिया को जीतने की मंशा से तैयार नहीं होते..औजार दुनिया में आदमी की जिन्दगी को सहज और सरल बनाने के लिए रचे जाते हैं..औजार का संदेश है-दुनिया को खोजो और दुनिया के रुपहले चित्रपट पर अनोखे रंग देखकर चकित रह जाओ..मंत्रमुग्ध भाव से दुनिया को प्यार करो..और सोचो..इस दुनिया में तुम कितने छोटे और कितनी बोलियों भाषाओं में गूंगे हो..इयान की यात्रा और इयान का साइकिल प्रेम इस जीवन-दर्शन का भी संकेत हो सकता है..
एक बात और..कहीं पढ़ा था--विनोबा भावे के दो शिष्यों ने एक दौर में परमाणु अप्रसार का वैश्विक संदेश लेकर दुनिया की यात्रा की तो विनोबा की उनको सलाह थी--जेब में फूटी कौड़ी ना रखना..और पैदल यात्रा करना..दोनों ने ऐसा ही किया..और चमत्कार हुआ..पाकिस्तान से गुजरते हुए विनोबा के दोनों शिष्यों को कबीलों के बाशिन्दों से इतना प्यार मिला-कि उन दोनों के लिए राष्ट्रीयता बेमानी बन गई..शायद इयान और उनकी साइकिल आदमीयत की इस अंतहीन सीमा को छूने की कोशिश हैं--जहां जाकर पहचानों का सारा दुनियावी फर्क मिट जाता है--
इयान और उनकी साइकिल से परिचय करवाने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया..
चंदन श्रीवास्तव