Monday, September 22, 2008

इरफान की छाया से बाहर आते युसूफ पठान

हवा में लहराते एक हाथ में बल्ला। दूसरे हाथ में हैलमेट। एक सकून के साथ अपने लम्हे को जीते युसूफ पठान। आज अखबारों में छपी इस तस्वीर को मैं बार बार पढ़ने की कोशिश कर रहा हूं। बार बार ये तस्वीर मुझे 15 साल पीछे ले जाती है। यादों का कारवां एक झटके में चेन्नई के चेपक से मुंबई के वानखेडे का रुख करता है। युसूफ पठान के अंदाज में सामने खड़े होते हैं विनोद कांबली।

1993 के फरवरी महीने के आखिरी दिन थे। ग्राहम गूज की अगुवाई में इंग्लैंड की टीम सीरिज का तीसरा और आखरी टेस्ट खेल रही थी। मैच के चौथे दिन लंच के करीब विनोद कांबली ने अपना दोहरा शतक पूरा किया। इस मुकाम पर पहुंचते ही कांबली ने बल्ले को बार बार हवा में लहराया। फिर,युसूफ पठान की तरह उनका बल्ला और हेलमेट ड्रेसिंग रुम और पैवेलियन की तरफ रुख कर ठहर गया। एक ठहरी हुई तस्वीर में तब्दील होता हुआ।

मेरे लिए ये तस्वीर हमेशा हमेशा के लिए ठहर चुकी है। कांबली की इस पारी में शतक से दोहरे शतक के बीच महज आंकडों में ही एक मंजिल हासिल नहीं की। इन 100 रनों के दरम्यान कांबली की एक नयी शख्सियत से रुबरु होने का मौका मिला। तीसरे दिन 100 रनों से पार करते हुए कांबली कुछ देर के लिए भूल गए कि उन्होंने टेस्ट में अपना पहला शतक पूरा कर लिया। वे इस मंजिल तक पहुंचने की खुशी को जाहिर नहीं कर पाए। या कुछ देर के लिए वो इस क्षण से चूक गए। एक ऐसा पल,जिसे छूने की चाह में उन्होंने दिन रात के फासले को खत्म कर दिया होगा। कांबली इस मुकाम की विराटता को महसूस करने में चूकते दिखायी दे रहे थे।

मैं आज भी इस सवाल के जवाब को जितना टटोलता हूं,उतनी ही सटीकता से उसका जवाब मेरे सामने आता है। पंद्रह साल बाद भी इसका सच मुझे मालूम नहीं लेकिन मुझे जवाब एक ही मिलता है। आखिर,उस दिन कांबली पहली बार टेस्ट क्रिकेट में तीन अंकों में पहुंचे तो दूसरे छोर पर सचिन तेंदुलकर मौजूद थे। कांबली के हिस्से की क्रिकेट में हर बार मौजूद रहे तेंदुलकर आज भी दूसरे छोर पर खड़े थे। शारदा आश्रम स्कूल से लेकर मुंबई रणजी टीम और भारत के लिए तेंदुलकर की छाया में ही कांबली अपना सफर तय कर रहे थे। कांबली के इस लम्हे से पहले ही तेंदुलकर को क्रिकेट की दुनिया ने एक नए पायदान पर काबिज कर दिया था। उनमें ब्रैडमैन की झलक दिखी जा रही थी। क्रिकेट के बाजार ने तेंदुलकर को एक ब्रांड में तब्दील कर दिया था। शायद इसीलिए, दोस्ताना दौड़ में खेल के मैदान में भी कांबली अपनी नयी मंजिल पर पहुंचकर भी कहीं पीछे छूटे दिख रहे थे।

फिर चौथे दिन कांबली ने अपने करियर का पहला दोहरा शतक पूरा किया। आज दूसरे छोर पर तेंदुलकर मौजूद नहीं थे। कांबली अब अपने लम्हे को खुलकर जी रहे थे। शायद,वो तेंदुलकर के लेजेंड की छाया से बाहर आ रहे थे। इस हद तक कि उन्होंने न सिर्फ तेंदुलकर से पहले टेस्ट क्रिकेट में दोहरा शतक पूरा कर डाला बल्कि दिल्ली में जिम्बाव्वे के खिलाफ इसी कामयाबी को दोहराते हुए टेस्ट इतिहास में सर डॉन ब्रेडमैन और लेन हटन के बराबार जा खड़े हुए। लगातार दो मैचों में दो दोहरे शतक। ये नए विनोद कांबली थे।

चेन्नई में युसूफ पठान की ये तस्वीर भी अपने छोटे भाई इरफान पठान की छाया से बाहर आते युसूफ पठान का आभास करा रही थी। इरफान पठान भारतीय क्रिकेट में एक पोस्टर ब्यॉय । युसूफ से पहले उन्हें मौका मिला। इस मौके को कामयाबी में तब्दील कर कहानियों में ढलते चले गए इरफान पठान। बार बार यह आभास कराते हुए कि ये देश कामयाबियों का ही जश्न मनाता है। इसलिए इरफान पठान का टीम में आना, उससे बाहर होना या फिर वापसी-हर कुछ एक खबर में तब्दील होता गया। लेकिन, दूसरी ओर संभावनाओं को तरजीह देने में चूकते रहे इस देश में युसूफ पीछे छूटते रहे। युसूफ घरेलू क्रिकेट में लाजवाब खेलते हुए भी सुर्खियों में नहीं आ पाए। उनकी कामयाबियां जाहिर भी हुईं तो वो युसूफ पठान की कामयाबी कम, इरफान पठान के भाई की कामयाबी ज्यादा कहलायीं। बावजूद इसके कि खुद इरफान लगातार कहते रहे-युसूफ मुझसे ज्यादा टेलेंटेड हैं।

लेकिन,चेन्नई में न्यूजीलैंड ‘ए’ के खिलाफ खेली युसूफ की पारी को आंकडों में आप जितना भी पढ़ते जाएं, उतना ही उनकी शख्सियत एक नए सिरे से गढ़ती चली जाती है। उतना ही वो इरफान पठान की छाया से बाहर आते दिखायी देते हैं। 148 रनों की इस तूफानी पारी में 9 छक्कों की बारिश उनके ताकतवर स्ट्रोकों की बानगी बनकर सामने आती है। पचास ओवर में भारत ए की पारी को 305 रनों तक ले जाते युसूफ एक भरोसेमंद बल्लेबाज की परिभाषा में शिद्दत से उभार लेते हैं।

इस पारी के दौरान युसूफ की बेताबी साफ झलकती है। मौके के जरिए अपनी दर्ज कराने की बेताबी। मैच की पूर्व संध्या पर वो लगातार इस बात को लेकर फिक्रमंद थे कि आखिर सातवें नंबर पर बल्लेबाजी करते हुए वो कैसे खुद को साबित कर पाएंगे। खासकर उस टीम में ,जहां उनकी तरह हर दूसरा बल्लेबाज भारतीय टीम में जगह बनाने के लिए जी जान से जुटा हो। अपने इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए वो कोच डेव व्हाटमोर तक भी जा पहुंचे। व्हाटमोर का जवाब था-सातवे नंबर पर सेंचुरी जमाना बहुत मुश्किल है लेकिन सातवे नंबर की भूमिका बहुत अहम है। टीम में उसके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रविवार को महज 15 ओवर में भारत ‘ए’ के पांच विकेट महज 66 रन पर ढह गए। मौका युसूफ पठान के हाथ में था। 35 ओवर तक बल्लेबाजी करने का मौका। उन्होंने इसे हाथ से जाने नहीं दिया।

दरअसल, युसूफ पठान पिछले एक साल से लगातार अपने हाथ में आए हर मौके को नतीजों में बदलने में जुटे हैं। 20-20 वर्ल्ड कप के फाइनल में सहवाग की गैरमौजूदगी में पारी की शुरुआत की जिम्मेदारी सौंपी गई। युसूफ ने मोहम्मद आसिफ की पहली ही गेंद को अपने ताकतवर प्रहार से मैदान के बाहर कर डाला। आईपीएल में कप्तान शेन वार्न ने उन्हें जिम्मेदारी के साथ आक्रामक रुख बरकरार रखने की हिदायत दी। फाइनल मुकाबले तक वो लगातार अपने कप्तान की उम्मीदों को परवान चढ़ाते रहे। कभी अपनी तूफानी पारियों से तो कभी अपनी सधी ऑफ स्पिन गेंदों से। इस हद तक कि इस ऑलराउंड खेल से वो आईपीएल के ‘मैन ऑफ द फाइनल’ बनकर सामने आए। इस प्रदर्शन से उन्हें भारतीय वनडे टीम में उन्हें जगह मिली। लेकिन उनकी नाकामी ने एक बार फिर उन्हें इरफान पठान के बड़े भाई के दायरे में बांध दिया। लेकिन, चेन्नई में रविवार को खेली इस पारी ने शायद एक बार फिर युसूफ को इस छाया से बाहर निकाल दिया है। ये युसूफ पठान की पारी है। भारतीय क्रिकेट में अपनी मौजूदगी का अहसास कराते युसूफ पठान की यादगार पारी।

3 comments:

Manish Kumar said...

mujhe bhi achcha laga is khabar ko padhkar. 20-20 ke baad unka form thoda off colour ho gaya tha. ab phir se laut aaaya dikhta hai.

Udan Tashtari said...

सही है फॉर्म में लौटे तो!!

diery said...

sanjay srivastava said
आपने युसूफ पठान के लिए एकदम सही लिखा है. उन्हें अपने छोटे भाई की छाया से बाहर आना था और अब वो ऐसा कर चुके हैं. उन्हें ज़्यादा मौके नही मिले लेकिन जितने भी मिले, उनका उन्होंने बखूबी इस्तेमाल किया. इसमे कोई शक नहीं कि वो वाकई tallented हैं. उनके जैसे hitter कि टीम को जरूरत भी है. हाँ, मैं विनोद काम्बली के बारे मैं ये जरूर कहना चाहूँगा कि जितनी प्रतिभा उनके अन्दर थी, उसके हिसाब से उन्हें उतना मौका मिल नही पाया.
संजय श्रीवास्तव