Monday, October 20, 2008

सहवाग-गंभीर : भारतीय क्रिकेट में जीत का सलामी चेहरा

वीरेन्द्र सहवाग और गौतम गंभीर। एक दाएं हाथ का बल्लेबाज और दूसरा बाएं हाथ का। इन दोनों में सिर्फ इतना ही फ़र्क था। हो सकता है मेरी बात अतिश्योक्ति लगे। लेकिन, मोहाली में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दूसरे टेस्ट मैच के चौथे दिन इन दोनों के बल्लों से बहते स्ट्रोक से ऐसा ही लगा। लगातार गेंदबाज पर जवाबी हमले करने की सोच के बीच अपनी टीम को जल्द से जल्द एक विजयी लक्ष्य की ओर ले जाने की जिद के साथ ये दोनों बल्लेबाज एक दूसरे से होड़ भी करते दिखे।

इन दोनों बल्लेबाजों के इस रुख से भारत ने आस्ट्रेलिया को उसी के आक्रामक अंदाज में मुकाबले में हाशिए पर डाल दिया। भारतीय क्रिकेट के लिए इन दोनों की जुगलबंदी एक नयी शुरुआत है। भारतीय क्रिकेट में सलामी बल्लेबाजों की एक बनी बनायी छवि को तोड़ते हुए। सहवाग ने एक छोर पर बड़ी तूफानी पारियां पारी खेलते हुए भारतीय क्रिकेट में इस आक्रामकता की नींव रखी है। लेकिन, अब दूसरे छोर पर भी ऐसे ही तेवरों के साथ गंभीर की मौजूदगी भारतीय क्रिकेट के लिए नया अनुभव है। इन दोनों की विकेट पर मौजूदगी न केवल विपक्षी खेमे में खौफ पैदा करती है बल्कि ये जीत की राह भी तैयार करती दिखती है। ये एक विजयी कंबिनेशन है। गौतम गंभीर और वीरेन्द्र सहवाग।

आखिर, इससे पहले भारतीय क्रिकेट में सलामी बल्लेबाजी की परिभाषा सुनील गावस्कर से शुरु होकर सुनील गावस्कर पर ही खत्म होती रही है। भारतीय क्रिकेट के इस महानायक की उपलब्धियों के बीच हम लगातार सलामी बल्लेबाज की भूमिका को एक ठोस शुरुआत की उम्मीद की शक्ल में ही देखने के आदी रहे हैं। गावस्कर की चट्टानी दीवार के साथ दूसरे छोर पर अमूमन बल्लेबाज एक साथी की भूमिका में ही दिखायी दिए। गावस्कर के लेजेंड की छाया से निकलना उसके लिए मुमकिन भी नहीं था। अंशुमन गायकवाड़ से लेकर दिलीप वेंगसरकर या रामनाथ पारकर से लेकर रवि शास्त्री तक। फिर भी,इनमें गावस्कर के साथ जो नाम जुड़ कर रह गया,वो था चेतन चौहान का। 70 के दशक में आस्ट्रेलिया के उछाल लेते विकेट से लेकर इंग्लैंड के सीमिंग ट्रैक और पाकिस्तान के तूफानी आक्रमण के बीच चौहान के साथ गावस्कर ने पहले विकेट के लिए सबसे ज्यादा रन जोड़े। 53.53 के औसत से 3010 रन।

गावस्कर के साथ दूसरे छोर पर अगर सहवाग के आसपास कोई छवि ठहरती है तो वो है मौजूदा चयनसमिति के अध्यक्ष कृष्णामाचारी श्रीकांत की। लेकिन,श्रीकांत की भी टेस्ट में नवजोत सिद्धू के साथ सलामी जोड़ी ज्यादा परवान चढ़ी। यहां भी टेस्ट में एक छोर पर खड़े नवजोत का बल्ला गेंद को रोकने में ज्यादा यकीं करता था बजाय उस पर रन बटोरने के।

एक ही स्टेट टीम के लिए खेलने वाले सहवाग-गंभीर की सलामी जोडी का हर तरह की क्रिकेट में एक साथ विकेट पर पहुंचना दोनों के बीच एक शानदार तालमेल बनाता है। इससे पार पाना हर विपक्षी टीम के लिए चुनौती बन जाता है। सहवाग और गंभीर की मौजूदगी दोनों छोर से गेंदबाज पर जवाबी हमला करने में यकीं रखती है। इन दोनों बल्लेबाज के जेहन में गेंदबाज संशय पैदा नहीं करता, ये दोनों अपने स्ट्रोक्स से गेंदबाज को पसोपेश में डालते दिखायी देते हैं। मोहाली टेस्ट के चौथे दिन भी पोंटिंग और उनके साथी इन्हीं पहलुओं से जूझते दिखायी दिए। गंभीर और सहवाग ने पहले विकेट के लिए केवल 39.1 ओवरों में साढ़े चार की ज्‍यादा औसत से 182 रन जोड़ डाले। सहवाग की बल्लेबाजी में न सिर्फ ताकत और टाइमिंग का समावेश था,जरुरत पड़ने पर नफासत भरे स्ट्रोक्स भी मौजूद थे।शायद यही वजह थी कि रवि शास्त्री बेहिचक उनकी तुलना गॉर्डन ग्रीनीज से करने लगे हैं। मजबूत डिफेंस के साथ तेज आक्रमण करने वाले गॉर्डन ग्रीनीज से।

लेकिन,अगर सहवाग ग्रीनीज की यादों को ताजा करते हैं तो गौतम गंभीर को भी आप रॉय फेड्रिक्स की तरह खेलते देख सकते हैं। वो रॉय फेड्रिक्स, जो मैच की पहली गेंद पर छक्का लगाने का जोखिम उठा सकते थे। कमजोर गेंद को ऐसी नसीहत देने में गंभीर भी कोई चूक नहीं दिखाते। फिर, सोमवार को तो वो टेस्ट में दो तिहरे शतक बना चुके अपने वरिष्ठ साथी सहवाग के साथ हर स्ट्रोक के साथ स्ट्रोक मिलाने में जुटे थे। इस हद तक कि सहवाग पोंटिंग के सीमा रेखा पर तैनात फील्डर से पार पाने में कई बार मशक्कत कर रहे थे, लेकिन गंभीर अपने स्ट्रोक्स के प्लेसमेंट में अपने साथी से बीस साबित हो रहे थे। सीडल की गेंद को स्लिप के रास्ते थर्डमैन की ओर भेजना हो या फिर जॉनसन के खिलाफ आगे बढ़ते हुए गेंद को मिडविकेट सीमा के बाहर। गंभीर अपनी छाप लगातार छोड़ रहे थे। इसी के चलते गंभीर ने इस बार अपनी हाफ सेंचुरी को अपने दूसरे टेस्ट शतक में तब्दील करने में कोई चूक नहीं की।

अगर ग्रीनीज और फेड्रिक्स से हटकर भारतीय संदर्भ में देखें तो इन दोनों की आक्रामक सोच इतिहास में हमें विजय मर्चेंट और मुश्ताक अली की सलामी जोड़ी की याद दिलाती है। इन दोनों ने चार टेस्ट मैच की सात पारी में 83.42 के औसत से 584 रन जोड़े थे। इन बिन्दु पर सहवाग और गंभीर मोहाली टेस्ट समेत अब तक 17 टेस्ट मैच की 29 पारियों में 63.25 के औसत से 1771 रन जोड़ चुके हैं। इसमें भी चार बार उन्होंने शतकीय साझेदारी पूरी की है,जबकि 11 बार पचास से ज्यादा का स्कोर करते हुए टीम को एक बेहतर शुरुआत भी दी है। इससे भी ज्यादा दिलचस्प पहलू यह है कि इन 17 टेस्ट मैच में अब तक भारत 9 बार जीत तक पहुंचा है,जबकि मोहाली टेस्ट मे भी ठीक इसके मुहाने पर खड़ा है।
इन सबके बीच ये जोड़ी भारतीय क्रिकेट को एक नयी राह पर मोड़ रही है। ड्रा की पुरानी पड़ चुकी सोच से पहले जीत में यकीं करने वाली मौजूदा भारतीय टीम में सचिन तेंदुलकर से लेकर राहुल द्रविड़,सौरव गांगुली, हरभजन सिंह, अनिल कुंबले और महेन्द्र सिंह धोनी जैसे मैच विनर मौजूद हैं। लेकिन,इनके बीच ये जोड़ी भी एक नए विनिंग कंबिनेशन के तौर पर स्थापित हो चुकी है। इनसे मिलती शुरुआत से कप्तान अपनी जीत की व्यूह रचना रच सकता है। ये भारतीय क्रिकेट में जीत का सलामी चेहरा है।

2 comments:

chandan said...

"...सलामी बल्लेबाजी की परिभाषा सुनील गावस्कर से शुरु होकर सुनील गावस्कर पर ही खत्म होती रही है..ये एक विजयी कांबिनेशन है-गौतम गंभीर और वीरेन्द्र सहवाग..ड्रा की पुरानी पड़ चुकी सोच से अलग जीत में यकीं करने वाली मौजूदा भारतीय टींम..."
कुल तीन पंक्तियां--और बस इन तीन पंक्तियों में भारतीय क्रिकेट के बदलाव की नुमाइंदगी हो गई-जब कोई क्रिकेट में डूबकर लिखता है तभी रचे जाते हैं ऐसे सूत्रवाक्य..
बेजोड़..

चंदन श्रीवास्तव

Udan Tashtari said...

भारत टीम को शुभकामनाऐं.