Monday, October 13, 2008

बेंगलुरु में मुरझा गई सचिन की पारी, मोहाली में खिलने के लिए

मशहूर पूर्व कोच दिवंगत बॉब वूल्मर ने अपनी आखिरी किताब ' आर्ट एंड साइंस ऑफ क्रिकेट' में विकेट पर मौजूद बल्लेबाज की मनोस्थिति को बेहद बारीकी से पकड़ने की कोशिश की है। विकेट पर मौजूद बल्लेबाज के साथ दूसरे छोर पर उसका एक साथी मौजूद रहता है। बाब वूल्‍मर कहते हैं, जिस वक्त वो गेंदबाज का सामना करता है,तो वो बिलकुल अकेला होता है। मैदान में मौजूद विपक्षी टीम के 11 खिलाड़ी उसके विकेट तक पहुंचने के लिए पूरी तरह से जुटे रहते हैं। इस पहलू को जानते समझते बल्लेबाज हल्की सी भी चूक करने का जोखिम नहीं उठा सकता। अपने इस संघर्ष में बल्लेबाज को ज़रुरत पड़ती है- स्किल, एकाग्रता, पूर्वानुमान और स्टेमिना।

बेंगलुरु के चेन्नास्वामी स्टेडियम में सोमवार को सचिन तेंदुलकर भी इसी तरह आस्ट्रेलिया के खिलाफ अपनी पारी को शक्ल देने में जुटे थे। लेकिन, उन पर सिर्फ पोंटिंग और उनके साथियों का ही दबाव नहीं था। तेंदुलकर पर भारतीय पारी को किनारे तक ले जाने का भार था। श्रीलंका के निराशाजनक दौरे के बाद उनकी बल्लेबाजी फॉर्म सवालों के घेरे में थी। साथ ही, ब्रायन लारा के खड़े किए गए 11953 रनों के शिखर पर पहुंचने की चुनौती भी दी थी। फिर इसी टेस्‍ट की पहली पारी में भी तेंदुलकर सिर्फ 13 रन बनाकर पेवेलियन लौट गए थे। लेकिन, इस दूसरी पारी में तेंदुलकर अपने अनुभव, टेलेंट, जीनियस की छाप छोड़ते हुए इन दबाव के बीच से राह तलाश रहे थे। ये तेंदुलकर के जीनियस को सामने लाती पारी थी।

लेकिन, कैमरोन व्हाइट की एक थोड़ी सी ओवरपिच गेंद पर तेंदुलकर के स्ट्रोक का टाइमिंग गड़बड़ा गया। बल्ला कुछ पहले आया। गेंद कुछ ठहर कर। तेंदुलकर का ड्राइव जब तक पूरा होता गेंद कवर पर माइकल क्लार्क के हाथों में थी। अपना पहला टेस्ट मैच खेल रहे कैमरोन व्हाइट के लिए तेंदुलकर का विकेट एक बेहद भावुक लम्हा था। अपने साथियों की खुशी के बीच वो इसे महसूस करने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन, इस भीड़ से दूर वापस पैवेलियन वापस लौटते तेंदुलकर के लिए यह लगातार सोच में डूबने-उतरने का दौर था। गर्दन झटकते, अपने से नाराज बल्ले को हवा में लहराते सचिन को देख इसे महसूस किया जा सकता था।

कैमरोन व्हाइट की इस गेंद से पहले सचिन तेंदुलकर तमाम विपरित हालात के बीच बेहद मजबूती से अपनी पारी को गढ़ रहे थे। पारी के नौवें ओवर में द्रविड़ का विकेट गिरने के बाद मोर्चा संभालने पहुंचे तेंदुलकर पिछले 40 ओवर से विकेट पर मौजूद थे। इस असमान उछाल के विकेट पर फ्रंटफुट से लेकर बैकफुट तक उनका संतुलन देखते ही बनता था। तेंदुलकर के स्ट्रोक बल्लेबाजी को बेहद सहज बना रहे थे। इस हद तक कि दूसरे छोर पर पहले गौतम गंभीर और फिर वीवीएस लक्ष्मण के सामने भी आस्ट्रेलियाई गेंदबाजों की धार कमज़ोर पड़ती दिखने लगी।

तो फिर ये सचिन तेंदुलकर कैसे चूक गए? शायद, अपनी इस बेजोड़ पारी में लारा का करीब आता शिखर उन पर हावी हो गया हो। चिन्नास्वामी स्टेडियम पर मौसम करवट ले रहा था। पोंटिंग ने अपने तेज़ गेंदबाजों के बजाय स्पिनर माइकल क्लार्क और कैमरोन व्हाइट को मोर्चे पर लगा दिया था। शायद, एक क्षण के लिए तेंदुलकर को लगा हो कि लारा के इस शिखर से आगे निकलकर खुद को दबाव से मुक्त करने का यही मौका है। शायद कुछ देर के लिए वो इस शिखर पर खुद को काबिज होता देख रहे हों। इसी एक पल में अभी तक पूरी एकाग्रता से खेल रहे तेंदुलकर का ध्यान भटका हो। कैमरोन व्हाइट की उस गेंद पर उनके बल्ले और जेहन में तालमेल हल्का सा गड़बड़ाया हो और इसी वजह से तेंदुलकर की एक शिखर की ओर बढ़ती पारी अचानक ठहर गई।

शिखर के करीब एकाग्रता के चूकने का एक ऐसा ही वाक्या याद आ रहा है। बिलियर्ड्स के पूर्व वर्ल्‍ड चैंपियन गीत सेठी ने अपनी किताब 'सक्‍सेस वर्सेस जॉय' में स्‍नूकर के मशहूर खिलाड़ी थाईलैंड के जेम्स वटाना की एक यादगार कहानी का जिक्र किया है। वटाना एक प्रतियोगिता के दौरान ठीक जीत के मोड़ पर खड़े थे। ऐसी जीत जहां पर पहुंचते ही उन्हें करीब दो लाख पौंड का इनाम मिलना था। वटाना कुछ क्षणों के लिए खुद को विजयी मान ख्वाबों की दुनिया में पहुंच गए थे। उन्हें बैंकॉक के पॉश इलाके में एक बेहतरीन घर और तमाम सुविधाओं की महक आने लगी थी। लेकिन, जब तक वटाना वापस स्नूकर टेबल पर लौटते, मुकाबला उनके हाथ से फिसल गया था।

लेकिन, उन्हीं वटाना को कुछ साल बाद इंग्लैंड में एक टूर्नामेंट खेलते वक्त खबर मिली कि उनके पिता को गोली मार दी गई। मुकाबला शुरु होने में वक्त था। उनसे कहा गया कि तीन घंटे बाद आपको बैंकाक की फ्लाइट मिल सकती है। वटाना ने इस खबर को सुना और जवाब दिया, मैं आपको बताता हूं। लेकिन, वटाना बैंकॉक लौटने के बजाय सीधे स्नूकर के टेबल पर पहुंचे। कहा जाता है कि उन्होंने 147 अंकों का बेहतरीन ब्रेक खेला। गीत सेठी का मानना है कि स्नूकर में यह एक बेमिसाल ब्रेक था। एक कलाकार का ब्रेक। कहने का मतलब ये कि वटाना उस वक्त सिर्फ और सिर्फ अपनी टेबल पर ध्यान लगाए हुए थे। एक हल्के से क्षण के लिए भी वो इससे भटकना नहीं चाहते थे।

दरअसल, बल्लेबाज के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती होती है कि कैसे हर पिछली गेंद को भूल वो नयी गेंद के लिए खुद को नए सिरे से तैयार करे। लेकिन, बड़े से बड़ा लेजेंड भी एक हल्के से क्षण में कभी चूक जाता है। उसकी परवान चढ़ती पारी ठहर जाती है। इसी बेंगलुरु में दो दशक पहले सुनील गावस्कर की 96 रन की पारी भी पाकिस्तान के खिलाफ ऐसे ही ठहर गई थी। जीत के बेहद करीब पहुंचा भारत सिर्फ 16 रन से यह टेस्ट ही नहीं, सीरीज भी हार गया था।

पाकिस्तान के पूर्व कप्तान जावेद मियांदाद ने इस पारी के बाद गावस्कर को दुनिया का बेमिसाल बल्लेबाज बताया था। उनके मुताबिक, उस घुमावदार विकेट पर लेफ्ट आर्म स्पिनर इकबाल कासिम को ऑन साइड में ड्राइव करने का जोखिम सिर्फ कोई लेजेंड ही उठा सकता था। ये संयोग ही था कि गावस्कर का विकेट इकबाल कासिम को ही मिला। इस बड़ी पारी के छोटे से हिस्से में गावस्‍कर की एकाग्रता लड़खड़ाई और उनके विकेट के साथ भारत की एक संभावित जीत हार में बदल गई। ये वो गावस्कर थे, जिन्हें तेंदुलकर की तरह एकाग्रता की प्रतिमूर्ति कहा जाता है।

मैंने अपनी बात वूल्मर की किताब से शुरु की है, और वहीं से खत्म करना चाहूंगा।वूल्मर कहते हैं- क्रिकेट ऐसा खेल है,जहां एक क्षण में आपकी उम्मीदें धराशायी होती हैं,और अगले ही क्षण वो फिर उभार लेती हैं। एक बार फिर वो मुरझाती है, दोबारा खिलने के लिए। तेंदुलकर की पारी का ठहरना भी इसी की एक कड़ी कहा जा सकता है। एक उभार लेती पारी, जो बेंगलुरु में मुरझा गई, मोहाली में खिलने के लिए।

2 comments:

deepak said...

Awesome writing , I am new to your blog and now I realize what am I missing . You have a sound knowledge of game and with same command you note down your views in hindi . great clarity of thoughts .

Keep Posting !!

chandan said...

टेस्ट क्रिकेट को यों ही अनिश्चितताओं का खेल नहीं कहा जाता..पांच दिनी इस खेल में सिर्फ मनुष्य नहीं होते..प्रकृति भी होती है..बारिश होगी और खेल बंद हो जाएगा..और ये बारिश सुनिश्चित फैसले की ओर बढ़ते मैच का रुख पलट देगी।पिच बिना इशारा किये जगह जगह से टूट जाएगी और कोई अदना से गेंदबाज किसी खास स्पॉट को खोजकर बड़े बड़े बल्लेबाजों की गिल्ली उड़ा देगा..शुरुआत से पहले टॉस किया जाएगा और टॉस हमेशा ही एक जुआ है..ये टॉस तय करेगा कि पिच की रंगत भांपकर पहली गेंद कौन सी टीम फेंकेगी..पिच को भांपने में कैप्टन गलती कर सकते हैं..और जैसा कि आपने कहा और जो तेंदुलकर के साथ हुआ-गेंद की रफ्तार समझने में चूक हो सकती है-बल्ला बाद में आएगा-गेंद पहले टकराएगी और किनारे से किसी फिल्डर के हाथों में खिसक जाएगी-एक संभावनाशील पारी का अंत एकदम औचक में हो जाएगा..तो क्रिकेट की बनावट ही हर कदम पर उसे संभावनाओं का खेल बनाती है..संभावनाओं का ही एक नाम अनिश्चितता है..तेंदुलकर का लीजेंड हो या गावस्कर का-ये लाजेंड बना इसलिए क्योंकि अनिश्चितताओं के खेल क्रिकेट के ये दिग्गज अपने खेल से जहां तक हो सका अपनी तरफ से निश्चितता के मुकाम तक पहुंचे..अपने खेल से अपने बारे में विश्वास जगा सके कि गावस्कर या तेंदुलकर पिच पर हों तो ये निश्चित है कि एक छोर संभला रहेगा..इनका खेल दर्शक को भरोसा देता है कि क्रिकेट का स्वभाव(अनिश्चितता) एकबारगी इनके खेलखौशल के आगे थम जाएगा..लेकिन क्रिकेट के स्वभाव और लीजेंड के खेल कौशल के बीच की लड़ाई जारी रहती है..तेंदुलकर चूके तो अफसोस हुआ कि एक लीजेंड चूक गया..और खुशी हुई कि क्रिकेट का स्वभाव एक बार फिर खेल खौशल के आगे अपराजेय साबित हुआ..अगर क्रिकेट पर हमेशा खेल कौशल ही हावी हो तो हिन्दुस्तान कैसे विश्वविजेता बनता..कैसे कपिल का बल्ला जिम्बॉव्वे की सुनिश्चित जीत को हार में बदलता..और वो रिचर्डस का कैच कैसे कपिल के हाथों में थमता..
आपने हमेशा की तरह गहरे पानी में पैठकर लिखा है..बहुत अच्छा लेख..
चंदन श्रीवास्तव