Sunday, April 19, 2009

द्रविड़ से विटोरी तक मिलते संदेश को समझिए !

ये क्रिकेट की ही खूबसूरती है। एक खेल अपने भीतर कितने ही फॉर्मेट लेकर आगे बढ़ रहा है। एक छोर पर टेस्ट क्रिकेट है। दूसरे छोर पर टी-ट्वेंटी का फॉर्मेट। लेकिन हर मोर्चे पर क्रिकेट कामयाब है। आखिर क्यों? इसकी एक ही वजह है। आप किसी फॉर्मेट में दाखिल हो जाएँ, इसकी सोच नहीं बदलती। यह मूल रूप से बल्ले और गेंद के संघर्ष में ही सिमटा है। यहाँ बल्लेबाज के लिये जितनी गुंजाइश है, उतनी ही गेंदबाज के लिए। आईपीएल के पहले दो दिन इस बात को पुख्ता करते हैं। ये फटाफट क्रिकेट सिर्फ बल्लेबाजों का खेल है, महज 58 रन पर सिमटी राजस्थान रॉयल्स इस सोच को तोड़ती है . ये सिर्फ तेज गेंदबाजों का खेल है, हरभजन, वार्न और कुंबले के बाद आज विटोरी इस एकतरफा सोच पर विराम लगाते हैं।

मुझ जैसे क्रिकेट की पारंपरिक सोच में जीने वाले के लिये डेनियल वेटोरी का स्पेल कभी न भुलने वाला अनुभव है। रविवार को विटोरी की महज 18 गेंदों के बीच पंजाब किंग्स इलेवन की तूफानी रफ़्तार लेती पारी अचानक थम गयी। विटोरी का यही स्पेल था, जिसने बारिश से छोटे और छोटे होते इस मुकाबले में दिल्ली की जीत की जमीं तैयार की। उनकी इस गेंदबाजी के बाद मुझे अचानक बरसों पहले बिशन सिंह बेदी की कही बात याद आ गयी- विटोरी एक कम्प्लीट स्पिनर है। वो हर तरह की क्रिकेट मे कामयाब होगा। बेदी के कहने का मतलब यही था कि अगर आप बेहतर हैं तो आप हर मोर्चे पर कामयाब रहेंगे। चाहे वो टेस्ट हो या फिर फटाफट क्रिकेट। मौजूदा क्रिकेट मे सबसे बेहतरीन लेफ्ट आर्म स्पिनर विटोरी ने इसे फिर बखूबी साबित किया। वो भी सिर्फ और सिर्फ 18 गेंदों में।


फिर कल इसी पहलू पर वार्न और कुंबले भी खरे उतरे थे।। इनका प्रदर्शन विटोरी से एक कदम आगे ठहरता है। लेग स्पिनर होने के नाते इन्हें अपनी गेंदबाजी की लय पाने के लिये 5-6 ओवर चाहिए। .लेकिन ट्वेंटी ट्वेंटी के इस फॉर्मेट मे तो महज 4 ओवर में ही गेंदबाजी का मौका ख़त्म हो जाता है। फिर वार्न तो करीब एक साल के बाद किसी बड़े मुकाबले मे गेंदबाजी संभाल रहे थे। लेकिन सिर्फ पांचवी गेंद पर ही वो विकेट तक पहुँच रहे थे। लेगस्टंप पर पड़ी गेंद को जब तक विराट कोहली अपनी क्रीज छोड़ टर्न करने की कोशिश करते उनका मिडिल स्टंप गिर चुका था। ये शेन वार्न थे, लेग स्पिन के जाद्दू से रूबरू कराते हुए। ठीक इसी मुकाबले मे 5 महीने पहले अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से अलग हुए कुंबले थे। सिर्फ 19 गेंद मे 5 रन देकर 5 विकेट लेते हुए। मेरे जेहन में करीब 15 साल पहले कोलकत्ता के एडेन गार्डन पर वेस्ट इंडीज के खिलाफ हीरो कप मे 12 रन पर 6 विकेट लेते कुंबले की यादें जेहन में ताजा हो गयी। यह कुंबले के शिखर पर जाने की शुरुआत थी।

कुंबले और वार्ने जैसी परिपूर्णता से द्रविड़ और तेंदुलकर ने भी रूबरू कराया। भारत के मुकाबले मुश्किल दक्षिण अफ्रीकी विकेट पर वो आखिर तक एक छोर को संभाले ही नहीं खड़े थे। ये दोनों अपनी बेजोड़ तकनीक के दायरे को विस्तार देते हुए अपने स्ट्रोक्स को अंजाम दे रहे थे। मनप्रीत गोनी की गेंद पर कवर के ऊपर से जमाए बेहतरीन बाउंड्री में आप इसे महसूस कर सकते थे। वार्न की गेंद को आखिरी मौके पर थर्डमैन की ओर दिशा देते द्रविड़ के बल्ले में आप इस गूंज को महसूस कर सकते थे।

ये सभी नौजवान खिलाडियों को सन्देश दे रहे थे। बेशक, हम इस फटाफट क्रिकेट के अंतरराष्ट्रीय मंच पर नहीं हैं। लेकिन इस्सकी बारीकियाँ हम ज्यादा करीब से पकड़ सकते हैं। कुंबले से लेकर वार्न तक, द्रविड़ से लेकर सचिन तक अपने खेल से यही ऐलान कर रहे थे - सिर्फ नौजवानों का खेल नहीं है टी-20 । अनुभव की जगह यहाँ भी मौजूद है। बशर्ते आप खेल को परिपूर्णता में साकार करते हों। उसे भरपूर जीते हों। यही इस जेंटलमैन गेम की खूबसूरती है, जो हमें इसके हर लम्हे में साथ लेकर चलती है। फिर चाहे टेस्ट क्रिकेट हो या फिर आईपीएल की ये स्टेज हो।

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