Monday, December 8, 2008

मौत के सन्नाटे के बीच ज़िंदगी की राह तलाशते जीव

लाल जैकेट में जेटी कप हाथ में उठाए जीव मिल्खा सिंह की ये तस्वीर अमूमन हर खिताबी जीत के बाद यूं ही दिखायी देती है। यहां भी उनके होंठों पर तैरती मुस्कान मंजिल तक पहुंचने की कहानी बयां करती है। लेकिन,टोक्यो में रविवार की शाम यह तस्वीर हार और जीत के दायरे से बहुत दूर ले जाती है। ये खेल में ज़िंदगी के मायनों को तलाशती तस्वीर है। कैमरे की चौंधियाती रोशनी के बीच होंठो पर मजबूरन तैरती मुस्कुराहट के पीछे एक अंतहीन दर्द को समेटे तस्वीर हमसे रुबरु होती है।

जीव मिल्खा सिंह की इस तस्वीर को मैं हमेशा सहेज कर रखना चाहता हूं। समझना चाहता हूं कि मृत्यु के आखिरी शोक से पार जाकर आप कैसे ज़िंदगी जीने के हौसले को ढूंढ निकालते हैं। जीव ने टोक्यो में निप्पॉन सीरिज जेटी कप तक पहुंचते हुए सिर्फ गोल्फ का एक और खिताब हासिल नहीं किया। जीव ने इस खिताब तक पहुंचते हुए खेल के मैदान पर रची इंसानी हदों को पार कर डाला।

इस टूर्नामेंट से ठीक पहले जीव और उनकी पत्नी कुदरत का ख्वाब तार तार हो गया था। अपने आंगन में एक किलकारी की आहट संजोए दोनों ने तिनका तिनका एक ख्वाब को पिरोया था। लेकिन, किलकारी की गूंज इन दोनों के कानों में पहुंचने से बहुत पहले ही शांत हो चुकी थी। कुदरत के आंचल में किलकारी लेता बच्चा नहीं, एक मृत बच्चा था। किस्मत के इस क्रूर मजाक के सामने ये दोनों बेबस थे।

लेकिन,इस बेबसी और तार तार हुए ख्वाबों के बीच भी कुदरत ने जीव को टूटने नहीं दिया। जीव इस टूर्नामेंट में उतरने को तैयार नहीं थे। टूर्नामेंट से ठीक एक दिन पहले खेले जाने वाले जरुरी प्रो एम में भी उन्होंने हिस्सा नहीं लिया। लेकिन,जीव से जुड़ने के बाद हर वक्त उनके साथ मौजूद रहने वाली कुदरत ने जीव को उनके चहेते गोल्फ कोर्स से अलग हटने नहीं दिया। टूर्नामेंट आयोजकों से विशेष अनुमति के साथ जीव कोर्स पर उतरे। चार दिन तक मौत के इस कड़वे सच के बीच गोल्फ कोर्स पर ज़िंदगी के मायने तलाशने में जुटे रहे जीव।

कहने में ये आसान लगता है। लेकिन, मैं बार बार ये समझने की कोशिश कर रहा हूं कि कैसे हर एक स्ट्रोक पर जीव के हाथों में कंपकंपी पैदा नहीं हुई होगी। क्या स्ट्रोक लेते जीव के सामने लक्ष्य की शक्ल में सिर्फ ‘होल’ ही सामने नहीं होगा। कभी कुदरत का मुरझाया चेहरा उभार लेता होगा तो कभी उस बच्चे का चेहरा,जिसकी किलकारी कभी न खत्म होने वाले इंतजार में तब्दील हो गई।

इस सबके बीच से गुजरते हुए जीव ने बाकी दुनिया के लिए खिताब की राह तलाशी। लेकिन, अपने लिए ज़िंदगी की नयी राह। इसलिए, जीत के बाद जीव का यह कहना था-इस जीत से लगता है कि ईश्वर हमारे प्रति दयालु है। मुझे भरोसा है कि भविष्य में कुछ बेहतर छिपा है। उन्होंने यह जीत अपनी पत्नी कुदरत को समर्पित करते हुए कहा-उसके कहने पर मैं गोल्फ कोर्स में उतरने का हौसला बटोर पाया,इसलिए ये जीत मैं उसी को समर्पित करता हूं।

इस साल जीव ने चार खिताबी जीत हासिल की हैं। जीव को अभी कई मंजिलें तय करनी हैं। वर्ल्ड रैंकिंग में 44वें पायदान पर जा पहुंचे जीव के लिए आने वाला साल कामयाबियों के नये रास्ते खोलेगा। इन सबके बीच अपने करियर में नए शिखर की ओर बढ़ते जीव जब भी गोल्फ कोर्स को विदा कहेंगे, उनकी ये जीत बाकी सभी उपबल्धियों पर हावी हो जाएगी। आखिर, भावनात्मक झंझावत शारीरिक चोटों से पेश आने वाली परेशानियों से कहीं ज्यादा दुखद और बड़ी चुनौती सामने रखता है। चोट से जूझते हुए पिछली जुलाई में यहीं जापान में जीव ने सेगा सेमीकप हासिल किया था। यहां लगातार वो अपनी दांहिनी एडी के दर्द से जूझते हुए फिजियोथेरेपिस्ट की मदद से खिताब तक पहुंचे थे। लेकिन,ये शारीरिक चुनौतियां खिलाड़ी की ज़िंदगी का एक आम हिस्सा हैं। टाइगर वुड्स खराब घुटने के बावजूद यूएसओपन जीतते हैं,हेरिंग्टन कलाई में चोट के बावजूद ब्रिटिश ओपन के खिताब तक पहुंचते हैं। गोल्फ के कोर्स के बाहर हमनें सियोल ओलंपिक में सिर में टांके लगे होने के बावजूद ग्रेग लुआनिस को गोल्ड मेडल तक पहुंचते देखा है। हम वेस्टइंडीज में टूटे जबड़े के साथ अपनी गेंदों से ब्रायन लारा के विकेट तक पहुंचते अनिल कुंबले की कामयाबी से रुबरु हुए हैं।

लेकिन,इन चुनौतियों से खिलाड़ी अपने जीवट और इरादों से पार पा लेता है। इस मोड़ पर मुझे ब्रिस्टल मे केन्या के खिलाफ सेंचुरी जमाकर आसमान की ओर निहारते सचिन तेंदुलकर का चेहरा बरबस याद आ जाता है। 1999 के वर्ल्ड कप के ठीक बीच सचिन ने अपने पिता को खो दिया था। वो अपने पिता को आखिरी विदाई देकर एक बार फिर मैदान में थे। सेंचुरी जमाकर सचिन ने बाकी दुनिया को जीत का तोहफा पेश किया था। यहीं विराट कोहली भी याद आते हैं। रणजी मुकाबले के बीच पिता के निधन के बावजूद वो मैदान पहुंचते हैं। अपनी टीम दिल्ली को मुश्किल से निकाल किनारे तक ले जाते हैं। अपनी पारी खत्म कर पिता के अंतिम संस्कार में शरीक होते हैं।

सचिन और विराट की तरह जीव के लिए भी ये जीत से आगे की दुनिया है। मौत के सन्नाटे के बीच से ज़िंदगी के मायने तलाशती हुई। खेल को ज़िंदगी के सबसे करीब जोड़ते हुए।

1 comment:

diery said...

sanjay srivastava
जीव को सलाम...ऐसे उदाहरण वाकई ज़िंदगी का एक नया ही रंग दिखाते हैं...शायद जिंदगी केवल उतनी है भी नही जितनी हम देख या महसूस कर पाते हैं
संजय श्रीवास्तव