Sunday, November 30, 2008

ये जीत की एकलौती सोच है

गावस्कर बॉर्डर ट्रॉफी को हाथ में लिए जश्न में डूबी भारतीय क्रिकेट टीम की तस्वीर को बार बार देखिए। जीत के जुनून में डूबे इन चेहरों के बीच एक चेहरा ढूंढना होगा। भारतीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी का चेहरा। जीत के इस सैलाब की अगुआई करने के बावजूद धोनी भारतीय क्रिकेट की इस ठहरी तस्वीर में पृष्ठभूमि में हैं। लेकिन,धोनी का मंजिल पाने के बाद खुद को पीछे खींच लेने का ये अकेला वाक्या नहीं है। ट्वेंटी-20 वर्ल्ड कप का खिताब जीतने से लेकर आस्ट्रेलिया पर ट्राइंगुलर सीरिज में ऐतिहासिक जीत तक धोनी टीम को मंजिल तक पहुंचाने के बाद अपने साथियों को इस विजयी लम्हे को जी लेने के लिए छोड़ देते हैं। जीत की नयी इबारतों के बीच यही खूबसूरती टीम इंडिया के इस नए चेहरे को एक अलहदा रंग से सराबोर कर रही है।

"'टीम में अगर आप एक दूसरे की कामयाबियों को इंजॉय करने लगें तो ये सबसे बड़ी बात है। अपनी हाफ सेंचुरी पर मेरा खुश होना स्वाभाविक है। लेकिन,मेरी इस उपलब्धि पर मेरे साथी भी आनंद में डूब जाएं,ये ज्यादा जरुरी है।"इंदौर में इंग्लैंड पर दो मैचों में दो बेहद इकतरफा जीत के बाद धोनी का यही कहना था। लेकिन,पहली नज़र में यह एक कप्तान की अपनी टीम को एकजुट करने के लिए बेहद सहज सोच कही जा सकती है। गहराई से मंथन करें तो ये टीम इंडिया को एक बेहतरीन यूनिट में तब्दील करने का पहला और आखिरी सूत्र है। धोनी की यही सोच भारत के पूर्व कप्तान, कोच और चयनसमिति के पूर्व अध्यक्ष चंदू बोर्डे को उनका कायल बना देती है।
"धोनी गांगुली की तरह 'इंस्टिक्ट' से कप्तानी नहीं करते। सौरव मैदान में अचानक कोई फैसला लेकर सबको हैरत में डाल देते थे। लेकिन,कामयाबी मिलते ही सबको सौरव के फैसले की दाद देनी पड़ती थी। लेकिन,धोनी बेहद शांत स्वभाव से अपने काम को अंजाम देते हैं। बेहद परिपक्वता और सहजता से।"

दरअसल,धोनी टीम इंडिया को आस्ट्रेलिया मॉडल की ओर ले जाते दिखते हैं। यहां टीम में हर खिलाड़ी की हिस्सेदारी है। टेस्ट से लेकर वनडे तक अलग अलग मोर्चों पर जीत का सिलसिला बरकरार रखना जरुरी है। लिहाजा धोनी भारतीय टीम को आस्ट्रेलिया से भी एक कदम आगे ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। ट्वेंटी-20 की बादशाहत,वनडे में वर्ल्ड चैंपियन पर फतेह और अब गावस्कर बार्डर ट्रॉफी में टेस्ट की अधिकारिक चैंपियन को शिकस्त। भारतीय टीम इस वक्त शिखर की ओर बढ़ रही है। बोर्डे का कहना है "आस्ट्रेलिया पर जीत से हमारा कॉन्फिडेंस बहुत बढ़ गया है। इंग्लैंड पर डोमिनेंस इसी का रिफ्लेक्शन है। भारतीय खिलाड़ी एक जिद के साथ खेलते हुए दिखायी दे रहे हैं।" पूर्व क्रिकेटर और कमेंन्टेटर अशोक मल्होत्रा इसी पहलू को और आगे ले जाते हैं। "इस टीम को कोई भय नहीं है। यहां कोई एक्स्ट्रा बैगेज नहीं हैं। सिर्फ और सिर्फ परफोरमेंस है।"


ये जीत की एकलौती सोच है। यही सूत्र पकड़कर दो दशक पहले आस्ट्रेलिया ने शिखर की ओर कदम बढ़ाया। 1987 की वर्ल्ड कप फतेह के बाद आस्ट्रेलिया में वेस्टइंडीज की बादशाहत को तोड़ने का भरोसा जागा था। इसे सच में तब्दील करने के लिए ग्रेग चैपल और बॉबी सिम्पसन जैसे कप्तानों ने एक ब्लू प्रिंट तैयार किया। इस ब्लू प्रिंट पर चलने की शुरुआत एलन बॉर्डर ने की। आठ साल बाद मार्क टेलर ने वेस्टइंडीज में इसे आखिरी फतेह में तब्दील किया। स्टीव वॉ ने इसे जीत के ऩए इतिहास में बदल डाला। और पोंटिंग ने जीत को एक सिलसिले और आदत में।

लेकिन,आज शिखर से बेदखल होती दिख रही आस्ट्रेलिया से भी चूक हुई। क्रिकेट की बाकी दुनिया के सामने मिसाल बना आस्ट्रेलिया अपने 'सेंटर ऑफ एक्सीलेंस' में खिलाड़ियों की फौज तो तैयार करता रहा लेकिन टेलेंटेड खिलाड़ियों को सही वक्त पर आस्ट्रेलियाई ड्रेसिंग रुम तक पहुंचाने मे उसकी रफ्तार लगातार धीमी होती गई। शुरुआत में जरुर बॉर्डर की जगह मार्क टेलर,स्लेटर की जगह लेंगर,इयान हिली की जगह गिलक्रिस्ट ने ली तो टीम की जीत का सिलसिला परवान चढ़ता रहा। गुजरते वक्त के साथ यह रफ्तार मद्धिम हुई। इस कदर कि टीम में सालों साल एक नए खिलाड़ी को जगह बनाना मुश्किल हो गया। माइकल क्लार्क और शेन टॉट को अपवाद मान लें तो माइकल हसी फर्स्ट क्लास में दस हजार रन बनाकर तीस साल की ढलती उम्र में आस्ट्रेलियाई टीम में पहुंचे। इसी का नतीजा था कि खिलाड़ियों की एसेंबली लाइन ही गायब होने लगी। इसीलिए ग्लैन मैक्ग्रा,शेन वार्न,गिलक्रिस्ट,डेमियन मार्टिन,जस्टिन लैंगर और स्टुअर्ट मैक्गिल की विदाई के साथ ही आस्ट्रेलियाई क्रिकेट मे शून्य गहराता जा रहा है।


इसीलिए,भारतीय क्रिकेट के सामने इस आस्ट्रेलियाई मॉडल पर चलने के साथ साथ इससे सीख लेने की भी जरुरत है। "नंबर एक की जगह को हथियाने के लिए हमें निरंतरता जाहिए। अपने प्रदर्शन को एक नियमित प्रकिया में तब्दील करना होगा।" भारतीय टीम के पूर्व कोच लालचंद राजपूत का कहना है "हर वक्त सामने आ रहे एक मुकाबले,एक सीरिज को ध्यान में रखकर आगे बढ़ना होगा।" भारत को यह काम सिर्फ टेस्ट में ही नहीं,वनडे और ट्वेंटी ट्वेंटी के तिहरे मोर्चे पर करना है। हर फॉर्मेट की खास जरुरतें हैं। इसी के मद्देनजर खिलाड़ियों के एक बड़े पूल से छांट छांटकर मुकाबलों में उतारना होगा।बोर्डे के मुताबिक "हमारे यंगस्टर्स बेहतर खेल रहे हैं। युवराज बेहतरीन फॉर्म में लौट रहे हैं। रोहित शर्मा मौजूद हैं। बद्रीनाथ को भी टीम में जगह मिलनी चाहिए। इन युवा खिलाड़ियों को जल्द से जल्द मौका देना होगा तभी इनका आत्मविश्वास बढ़ेगा।"

लेकिन,ये पेचीदा काम है। इसे कौन करेगा और यह कैसे होगा। बोर्डे कहते हैं
"यही काम सिलेक्शन कमेटी और कप्तान का है। "इसी बात को राजपूत आगे बढ़ाते हैं "इंडेक्शन सिलेक्टर्स के लिए चुनौती है। कब खिलाड़ी को टीम में जगह मिलनी चाहिए,ये एक बेहद चुनौतीपूर्ण काम है।"

इस आस्ट्रेलियाई जीत में ही भारत के लिए ज़हीर और ईशांत सबसे बड़े स्ट्राइक जोड़ी के रुप में उभरे। लेकिन,सवाल ये है कि कैसे लगातार आप इन दोनों को लंबे समय तक टीम की जरुरतों के मद्देनजर उतार सकते हैं। अशोक मल्होत्रा के मुताबिक "जहीर अपनी ऊर्जा को बचाकर उसे कायम रखना सीख गए हैं। कई बार छोटे रन अप से गेंदबाजी करते हैं। वो अपने करियर के सबसे बेहतरीन दौर मे चल रहे हैं। लेकिन, ईशांत को बचाकर चलना होगा। उनके करियर को सही पेस देना होगा। टेस्ट में खिलाया तो वनडे में एक दो मैचों में ब्रेक देना जरुरी है।" उनका मानना है कि हमारे पास तेज गेंदबाजों का एक भरपूर टेलेंट है। लेकिन, सभी का समझदारी से इस्तेमाल होना चाहिए। "

लेकिन,स्पिन गेंदबाजी में अनिल कुंबले के खालीपन को भरना आसान नहीं होगा। मल्होत्रा कहते हैं
"कुंबले को बनने में 16 साल लग गए। अमित मिश्रा को अभी लंबा रास्ता तय करना है। हरभजन को यह भार उठाना होगा तभी हम कुंबले के खालीपन को भर सकते हैं।" बोर्डे का मानना है कि कुंबले की सटीकता बेमिसाल थी लेकिन हमें अमित मिश्रा का हौसला बढ़ाना होगा। ये जानते हुए इस गेंदबाज के पास लेग स्पिन,गुगली,स्ट्रेटर वन सब कुछ है। राजपूत का कहना है कि भारत के पास अमित मिश्रा ही नहीं, पीयूष चावला भी इस जगह के लिए दूसरे विकल्प हैं। हमारे पास क्वालिटी बेंच स्ट्रैंथ है।

ऐसे में,जीत की इस राह के बीच टीम इंडिया के सामने चुनौतियों की लंबी फेहरिस्त है। शिखर पर काबिज होने के लिए जीत और सिर्फ जीत ही चाहिए,एक सिलसिले की तरह। कप्तान धोनी भी इसे बखूबी समझते हैं। उनका कहना है कि एक हार के बाद भी सवाल उठने शुरु हो सकते हैं। हमें जीत की निरंतरता बनाये रखनी होगी। वैसे, यही बात बोर्डे बेहद खूबसूरत अंदाज में कहते हैं-"इस सिलसिले को बनाए रखना होगा। दो जीत से ताजमहल नहीं बन सकता।"

[This article was first published in outlook (hindi)]

1 comment:

diery said...

sanjay srivastava
जीव को सलाम...ऐसे उदाहरण वाकई ज़िंदगी का एक नया ही रंग दिखाते हैं...शायद जिंदगी केवल उतनी है भी नही जितनी हम देख या महसूस कर पाते हैं
संजय श्रीवास्तव