Monday, November 10, 2008

टीम इंडिया को कमज़ोर समझ जीत की राह से भटकी पोंटिंग की टीम

अमित मिश्रा और जॉंटी रोड्स। इन दोनों के बीच आप कोई सिरा पकड़ नहीं सकते। एक फील्डर के नाते तो कतई नहीं। जॉंटी रोड़्स क्रिकेट की ज़मी पर फील्डिंग का दूसरा नाम। अमित मिश्रा ! उनकी फील्डिंग की बात शुरु की जाए तो मैदान पर उनकी छवि रोड्स की मुस्तैदी और चपलता से कोसो दूर ले जाती है।
लेकिन,यही अमित मिश्रा सोमवार को जॉंटी रोड्स का लम्हा जी रहे थे। नागपुर के विदर्भ क्रिकेट एसोसिएशन मैदान पर आस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पोंटिंग ने ज़हीर खान की गेंद को मिडऑफ की ओर पुश किया और तेजी से रन लेने के लिए दौड़ पड़े। मिड ऑफ पर तैनात मिश्रा ने एक ही एक्शन में गेंद पर कब्जा किया और उसी पल जमीन के समानान्तर हवा में अपने शरीर को फैलाते हुए दांहिने हाथ से गेंद को थ्रो किया और गिल्लियां बिखेर दीं। ये लम्हा 1992 के वर्ल्ड कप में इंजमाम उल हक को आउट करते जॉंटी रोड्स की एक ठहरी तस्वीर को लौटाता सा दिखा। पोंटिंग आखिरी कदम के फासले से रन पूरा करने से चूक गए थे।
लेकिन, शायद पोंटिंग अमित मिश्रा से ऐसे थ्रो की उम्मीद नहीं कर रहे थे। सोमवार की सुबह लॉंग ऑफ पर फील्डिंग करते हुए मिश्रा से हुई एक दो चूक के चलते वे उनकी इस फुर्ती को नज़रअंदाज कर बैठे। पोंटिंग की इस चूक के बाद आस्ट्रेलिया सिर्फ अगले 45 ओवर के दौरान यह टेस्ट ही नहीं हारा,उसने भारत और आस्ट्रेलिया के बीच प्रतिष्ठा की प्रतीक गावस्कर बॉर्डर ट्रॉफी भी गंवा दी।
बेशक,इस शिकस्त के बाद पोंटिंग यह कहें कि भारत ने उन्हें खेल के हर पहलू में हाशिए पर धकेल दिया लेकिन घर वापस लौटते पोंटिंग इस सच से भी मुंह नहीं मोड़ पाएंगे कि उन्होंने अमित मिश्रा की थ्रो की तरह भारतीय टीम की ताकत को भी नज़रअंदाज करने की कोशिश की। यह वो भारतीय टीम है,जिसने पिछले 10 साल में आस्ट्रेलियाई टीम को दो सीरिज में शिकस्त दी है। उस आस्ट्रेलियाई टीम को ,जिसने पिछले एक दशक के दौरान 31 टेस्ट सीरिज में कुल जमा तीन शिकस्त झेली हैं।साथ ही, 2005 में एशेज गंवाने के बाद लगातार 16 टेस्ट जीतने के सिलसिले को भी अगर तोड़ा था,तो भारत ने। वो भी आस्ट्रेलिया के सबसे पसंदीदा मैदान पर्थ पर।
इसके बावजूद पोंटिंग भारत पहुंचने के बाद से इसकी ताकत से आंख चुरा रहे थे। ठीक इसी तरह जैसे अमित मिश्रा के इस सटीक थ्रो से। एक दिन पहले भी जरुरत से ज्यादा आत्मविश्वास के चलते गिरफ्त में आता मुकाबला उनके हाथों से छिटक गया था। धोनी और हरभजन के बीच सातवें विकेट के लिए 108 रनो की साझेदारी ने आस्ट्रेलिया के हाथ में आती जीत को छीन लिया था। लेकिन, अब ये आस्ट्रेलिया में एक बडी बहस में तब्दील हो गया है कि पोंटिंग ने अपने करियर की एक बड़ी चूक करते हुए इन दोनों बल्लेबाजों को हावी होने का मौका दिया। पोंटिंग ने ओवरों की रफ्तार को बरकरार रखने के लिए स्ट्राइक गेंदबाजों के बजाय हसी,क्लार्क और व्हाइट को मोर्चे पर उतार दिया। वो इस मौके पर कप्तान पर लगने वाले संभावित निलंबन के भय में ये चूक कर बैठे।
चूक! आस्ट्रेलिया क्रिकेट की जीत की सोच में यह शब्द नहीं है। आस्ट्रेलियाई सोच है मैदान पर हर हाल में बेहतर रहने की । मुश्किल से मुश्किल मोड़ पर मुकाबले को अपनी ओर मोड़ने की। स्टीव वॉ से लेकर मार्क टेलर तक,शेन वार्न से लेकर मैक्ग्रा तक- आस्ट्रेलिया का मानना रहा है कि आप अपनी मानसिक सोच को जितना बेहतर करोगे,आपका स्किल उतना ही निखार लेगा। आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को ये कहा जाता है कि नाजुक मौकों पर खिलाड़ी जो फैसला करते हैं,वो ही आखिरी मौकों पर हार और जीत को तय करता है। पोंटिंग की ये चूक या ये फैसले भी भारत और आस्ट्रेलिया को जीत और हार के दो छोर पर खड़ा कर रहे हैं।
फिर,सोमवार की सुबह 90 ओवर में 369 रन के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए जुनून चाहिए था,न कि बेताबी। शुरुआत में अपने विकेट बचाकर ही आप इस मुश्किल लक्ष्य की ओर पहुंचने की आखिरी कोशिश कर सकते थे। लेकिन,आस्ट्रेलियाई बल्लेबाज पहली गेंद से ही मुकाबले को दो सेशन में पूरा करने का इरादा जता रहे थे। धोनी का भी कहना था कि आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी पांच रन की रफ्तार से रन बना रहे थे लेकिन हम जानते थे कि आप लगातार ऐसा नहीं कर सकते। कम से कम मौजूदा क्रिकेट में एक बेजोड़ तेज गेंदबाज जोड़ी के रुप मे उभार लेते ईशांत और ज़हीर खान के खिलाफ तो कतई नहीं। फिर,पोंटिंग शायद इस पहलू पर भी नज़र नहीं डाल सके कि भारत में रनों का पीछा करते हुए चौथी पारी में अब तक सबसे बड़ी जीत दर्ज की है वेस्टइंडीज ने। लेकिन, 1987-88 में खेले गए दिल्ली टेस्ट में उनके सामने लक्ष्य था सिर्फ 276 रन का।
ऐसे में, शेन वार्न और मैक्ग्रा के संन्यास के बाद से ही शिखर से उतरती दिख रही पोंटिंग की इस टीम को जरुरत थी बल्लेबाजी के सहारे जीत तक पहुंचने की। लेकिन,अनुभवहीन गेंदबाजी की भरपाई के लिए इस पूरी सीरिज में 2004 के स्टार माइकल क्लार्क से लेकर 2001 सीरिज के सबसे कामयाब बल्लेबाज मैथ्यू हैडन और खुद कप्तान पोंटिंग तक कोई भी बल्लेबाज 40 की औसत तक नहीं पहुंच सका। सिर्फ माइकल हसी की औसत ही 50 के पार जा सकी। इस मोड़ पर एयान चैपल के इस बयान पर गौर करना चाहिए कि बेशक आस्ट्रेलिया ने पिछले दस साल तक क्रिकेट की दुनिया पर राज किया है लेकिन जब भी उसे एक बेहतर और संतुलित आक्रमण से जूझना पड़ा है तो उसकी बल्लेबाजे चूक गए हैं। उनके मुताबिक,2005 के एशेज सीरिज में इंग्लैंड ने चार मीडियम पेसर के सटीक आक्रमण के सहारे सीरिज पर कब्जा किया था। यहां भारत की ओर से ईशांत शर्मा,जहीर खान के साथ साथ हरभजन और अमित मिश्रा के बेहद संतुलित प्रहार ने उन्हें संभलने का मौका नहीं दिया।
इनसे उलट आस्ट्रेलिया का कोई गेंदबाज भारत के बीस विकेट लेता नहीं दिखायी दिया। नागपुर में क्रेजा अकेले दम 12 विकेट तक पहुंचे तो इसने आस्ट्रेलियाई थिंक टैंक के लिए इस सीरिज में टीम कॉम्बिनेशन पर ही सवाल खड़ा कर दिया। आखिर,क्रेजा कैसे पहले तीन टेस्ट में टीम में जगह नहीं बना पाए। ये भी आस्ट्रेलिया के लिए बहस का एक और मुद्दा है। ऐसे में ये चूक या ये फैसले पोंटिंग की टीम को उस आस्ट्रेलियाई सोच से दूर ले जा रहे हैं,जो जीतना ही नहीं,जीत के शिखर पर बने रहना भी सिखाती है। फिलहाल,पोंटिंग की यह आस्ट्रेलियाई टीम शिखर की इस राह से भटक गई है।

2 comments:

यूनुस said...

पूरी सीरीज़ में आपकी सधी हुई समीक्षा पढ़ी और सच मानिए खेल का मज़ा दोगुना होता चला गया ।
भारत की जीत का स्‍वाद भी बढ़ गया । सचमुच खेल जिंदगी है ।

diery said...

sanjay srivastava
बहुत बढिया समीछा. जो जज्बा और तेवर ऑस्ट्रेलियाई टीम मे थे, वो अब टीम इंडिया मे नज़र आते हैं. बस ये स्थायित्व बना रहे...पर ये भी मानिए की धोनी भाग्यशाली कप्तान हैं.
sanjay srivastava