Monday, December 15, 2008

सचिन सही कहते हैं "प्लेयिंग फॉर इंडिया, नॉउ मोर दैन एवर"

ये सिर्फ सचिन तेंदुलकर का लम्हा था। तेंदुलकर जैसे इस एक लम्हे का दम साधे इंतजार कर रहे थे। शायद इसलिए,माइकल स्वॉन की गेंद को पैडल स्वीप के जरिए फाइन लैग की ओर मोड़ते ही उनकी मुठ्ठी भिंच चुकी थी। हवा में छलांग लगाते वो एक जोरदार हुंकार भर रहे थे। युवराज सिंह की बांहों में खुशी में डूबे तेंदुलकर मानो बीस साल से नहीं, पहली बार टेस्ट क्रिकेट की स्टेज पर किसी लम्हे से एकाकार हो रहे थे। तेंदुलकर इस लम्हे को पूरी तरह जी लेना चाहते थे। बीते दो दशक के दौरान हर घड़ी एक नए मुकाम की ओर बढ़ते तेंदुलकर के लिए इस एक स्ट्रोक ने मीलों का फासला तय कर डाला। इस एक स्ट्रोक से तेंदुलकर ने आंकडों में टेस्ट क्रिकेट में 41 बार तीन अंकों को छुआ। लेकिन,सचिन का ये शतक उनके बाकी 40 शतकों से अलहदा था। तेंदुलकर के इस एक स्ट्रोक और शतक के साथ भारत इंग्लैंड पर यादगार जीत दर्ज कर रहा था। वो भी मैच की चौथी पारी में 387 रन के पहाड़ जैसे लक्ष्य को हासिल करते हुए। इसलिए, इस मंज़िल तक पहुंचते ही तेंदुलकर को ये कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं थी-“ये मेरे शतकों की फेहरिस्त में सबसे ऊपर है।” तेंदुलकर के मुताबिक-“मैं हमेशा कहता रहा हूं मेरे शतक की अहमियत तभी है जब टीम जीते।” आज तेंदुलकर के शतक के साथ भारतीय टीम सिर्फ एक जीत नहीं,एक नए इतिहास को रच रही थी।

भारत ने चौथी पारी में 387 रन के लक्ष्य को हासिल करते हुए भारतीय उपमहाद्वीप में एक नया इतिहास रचा था। चेन्नई के असमान उछाल वाले इस विकेट पर इस यादगार जीत को जानकार 1971 में ओवल में दर्ज की गई ऐतिहासिक जीत से लेकर साल की शुरुआत में पर्थ में मिली फतेह के करीब खड़ा करने में जुटे थे। लेकिन, तेंदुलकर के लिए ये चेन्नई में आठ साल पहले हाथ से छिटके लम्हे को वापस अपनी मुठ्ठी में लाने का मौका था।

आखिर,चेन्नई में पाकिस्तान के खिलाफ तेंदुलकर अकेले दम अपनी टीम को जीत की दहलीज पर लाकर अचानक ठिठक गए थे। सिर्फ 271 रनों का पीछा करते तेंदुलकर सातवें बल्लेबाज के तौर पर पैवेलियन लौटे तो स्कोरबोर्ड पर भारत के 254 रन टंग चुके थे। लेकिन,जीत के लिए जरुरी 17 रन बनाने की कोशिश में बाकी तीन बल्लेबाज पांच रनों के भीतर ही पैवेलियन लौट गए। भारत सिर्फ 12 रन से ये मुकाबला हार गया था।

और इस शिकस्त से तेंदुलकर के साथ जुड़ गया कि वो बड़ी पारियां खेलने के बावजूद अपनी टीम को जीत तक पहुंचाने में अक्सर चूक जाते हैं। चौथी पारी में तेंदुलकर का बल्लेबाजी औसत इस आलोचना का एक आधार बनकर सामने आने लगा। चेन्नई से पहले 55 टेस्ट की 45 पारियों में चौथी बार खेलते हुए तेंदुलकर महज 33.61 के औसत से सिर्फ 1109 रन ही जोड़ पाए थे। ये उनके करियर औसत 54.30 से कहीं बहुत पीछे है। क्रिकेट की दुनिया में सबसे ज्यादा टेस्ट मैच खेलने वाले इस लेंजेंड के लिए अपनी उपलब्धियों के बीच यह पहलू भी बार बार एक कचोट की तरह उभार ले रहा होगा।

इसलिए,सोमवार की सुबह तीसरे ओवर में ही द्रविड़ के पैवेलियन लौटने के बाद तेंदुलकर ने एक छोर संभाला तो जीत के बाद ही वहां से ड्रेसिंग रुम की ओर कदम बढ़ाए। बेशक, वीरेन्द्र सहवाग की तूफानी पारी ने भारत के लिए इस नामुमकिन सी लगनी वाली जीत को हकीकत में तब्दील करने की राह खोली,लेकिन यह तेंदुलकर के दो दशक के अऩुभव को समेटे बेजोड़ पारी ही थी,जिसने भारत को जीत की मंजिल पर पहुंचा कर ही दम लिया।

आखिरी दिन,हर गुजरते ओवर के बीच मुकाबला पूरी तरह से तेंदुलकर के नियंत्रण में दिखा। उन्हें अपने स्ट्रोक खेलने में न कोई हड़बड़ाहट थी, न ही दूसरे छोर पर उनका साथ छोड़ते गंभीर और लक्ष्मण उनकी इरादों पर चोट पहुंचा रहे थे, और न ही युवराज की आक्रामक बल्लेबाजी उन पर किसी तरह का दबाव बना रही थी। युवराज के साथ उन्होंने पांचवे विकेट के लिए 163 रन की बेहतरीन नाबाद साझेदारी पूरी की। लेकिन, वो एक छोर पर अपनी टीम को लक्ष्य तक पहुंचाने में जुटे दिखे।

इससे भी आगे,तेंदुलकर की बल्लेबाजी के बीच चेन्नई के विकेट को लेकर छाया भय कहीं बहुत पीछे छूटता दिखायी दिया। ये साबित करते हुए कि विकेट के खौफ से ज्यादा किसी भी बल्लेबाज के लिए पॉजिटिव सोच जरुरी है। तेंदुलकर के इस बयान पर गौर कीजिए-विकेट में उछाल असमान था,लेकिन इन्हीं उछालों में रन बनाने के मौके थे। मैं सिर्फ इन मौकों को इंतजार कर रहा था। ये तेंदुलकर की पॉजिटिव एप्रोच की कहानी को खुद बयां करता है।

सवा पांच घंटे की अपनी बल्लेबाजी के दौरान 132 खाली गेंदों और 45 सिंगल्स में आप तेंदुलकर की विकेट पर टिके रहने की सोच को पढ़ सकते थे। एंडरसन से लेकर फ्लिंटॉफ की गेंद पर आखिरी क्षणों तक इंतजार के बाद उसे थर्डमैन से प्वाइंट की ओर दिशा देते तेंदुलकर में आप उनके पूरे अनुभव को महसूस कर सकते थे। इतना ही नहीं, जरुरत के मुताबिक रनों की रफ्तार को अपने मुताबिक ढालते तेंदुलकर में आप उनके जीनियस की झलक देख सकते थे। तेंदुलकर ने अपनी पारी में नौ बेहतरीन चौके भी जमाए। दूसरे छोर पर खड़े युवराज सिंह को सही वक्त पर सही स्ट्रोक्स खेलने की नसीहत के बीच आप भारतीय क्रिकेट के इस ‘स्टैट्समैन’ की भूमिका को आप परख सकते थे।

फिर,तेंदुलकर ने इस दौरान एक कैलेंडर ईयर में पांचवी बार 1000 रन छूने का कारनामा भी कर दिखाया। इस दौरान तेंदुलकर ने 52 रन की औसत से चार शतक के सहारे ये रन जोड़े हैं। 19 साल तक लगातार क्रिकेट खेलने के बाद रनों की ये बेताबी इस लेजेंड की शख्सियत को एक नया आयाम देती है। ये टेलीविजन के स्क्रीन पर मुंबई हादसों के बाद उभरते उनके विज्ञापन की पंच लाइन को ही पुख्ता करती दिखायी देती है। तेंदुलकर इस विज्ञापन में कहते हैं-आई एम प्लेयिंग फॉर इंडिया,नॉउ मोर दैन एवर(मैं भारत के लिए क्रिकेट खेल रहा है। अब,पहले से भी ज्यादा शिद्दत से)। सचमुच, तेंदुलकर 16 साल की उम्र में पाकिस्तान में अपने अंतरराष्ट्रीय करियर का आगाज करने वाले किशोर से भी ज्यादा शिद्दत से क्रिकेट की स्टेज पर नए रंग भरने में जुटे हैं। इसलिए, कल भी सिर्फ एक सचिन तेंदुलकर थे,और आज भी सिर्फ एक सचिन तेंदुलकर हैं।

2 comments:

अल्पना वर्मा said...

आज का खेल तो बहुत ही लाजवाब था..बिल्कुल सचिन की तरह !

Straight Point said...

लेख बहुत अच्छा लगा...

कृपया शीर्षक को ठीक कर लें...“प्लेयिंग फॉर इंडिया नॉउ मोर दैन एवर”