Sunday, August 24, 2008

बशर्ते ये कामयाबियां सिलसिले में तब्दील हों

खेलों का महाकुंभ अपने अंजाम तक पहुंच चुका है। ओलंपिक के इतिहास में भारत के लिए बीजिंग ओलंपिक का अपना महत्व रहेगा। बीजिंग ओलंपिक शुरु हुआ था,तो तिरंगा राज्यवर्धन राठौर के हाथ में था। पिछले ओलंपिक में सिल्वर मेडल जीतने वाले राठौर पर इस बार अरबों उम्मीदों का भार था,लेकिन वो कामयाब नहीं हो पाए, और अब ओलंपिक खत्म हो रहा है,तो तिरंगा मुक्केबाजी में कांस्य जीतने वाले विजेन्द्र के हाथों में होगा। लंदन ओलंपिक में विजेन्द्र पर भारत के अरबों लोगों की उम्मीदों का भार होगा,क्योंकि इस ओलंपिक के खत्म होते होते भारतीयों ने खेलों के महाकुंभ से उम्मीद की आदत पाल ली हैं। विजेन्द्र की कामयाबी पर मेरा यह लेख तीन दिन पहले दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ था।

आई एम द ग्रेटेस्ट! रिंग में उतरने से पहले मोहम्मद अली ऐसी ही हुंकार भरा करते थे। "मैं इसे पांचवे राउंड में ही नॉक आउट कर दूंगा। मैं इसे टिकने नहीं दूंगा।" बीसवीं सदी के महानतम एथलीट अली की ये गर्जनाएं आज भी खेल प्रेमियों में एक सिरहन पैदा कर देती हैं। ये पेशेवर मुक्केबाजी का वो दौर था,जहां मुकाबला अली से शुरु होकर अली तक सिमट जाता था। बस,सामने मुक्केबाज बदल जाया करते थे। कभी सोनी लिस्टन तो कभी जो फ्रेजियर।

बुधवार को खेलों के महाकुंभ ओलंपिक की मेजबानी कर रहे बीजिंग में भी एक ऐसी ही गर्जना सुनायी दी। बॉक्सिंग रिंग में पहुंचने से ठीक पहले एक और मुक्केबाज ने हुंकार भरी-आई एम द बेस्ट। मोहम्मद अली और इस नौजवान मुक्केबाज के खेल कौशल और उपलब्धियों के बीच उतना ही फासला था,जितना दिल्ली और न्यूयॉर्क के बीच। अगर,कोई बात साझा थी तो वो था इनका हौसला।

भारत के विजेन्द्र कुमार ऐसे ही फौलादी हौसलों के साथ बीजिंग के बॉक्सिंग रिंग में उतरे। महज 120-120 सेकेंड के चार राउंड के बाद वो रिंग से बाहर आए,तो उनकी दुनिया बदल चुकी थी। सिर्फ 11 मिनट पहले तक बीजिंग में हर किसी के लिए वो भारत का एक नौजवान मुक्केबाज था। लेकिन,11 मिनट बाद वो एक अरब से ज्यादा की आबादी के मुल्क भारत के एक छोटे से गांव कालूवास का विजेन्द्र कुमार था। वो विजेन्द्र, जिसने अपने मुक्कों में नए हौसलों को भर ओलंपिक के विक्ट्री पोडियम पर अपनी जगह तय कर ली थी। महज दस मिनट में रिंग में अपने प्रतिद्वंदी कार्लोस गोनगोरा पर किए प्रहारों ने हरियाणा के छोटे से शहर भिवानी के करीब बसे कालूवास को सुर्खियों में ला खड़ा किया था। विजेन्द्र की कामयाबी की दास्तान को अब बीजिंग से भिवानी तक हर कोई एक नए सिरे से गढ़ रहा था।

ये वो विजेन्द्र था,जिसने अपने बड़े भाई के अधूरे सपनों को पूरा करने की हिम्मत दिखायी थी। ये वो विजेन्द्र था,जिसके पिता ने उसके ख्वाबों को हकीकत में तब्दील करने के लिए बस चलाते चलाते दिन और रात के फासलों को खत्म कर दिया था। सिर्फ एक ऐसी सुबह के इंतजार में,जो समाज मे हाशिए पर छूटे इस परिवार को एक नयी पहचान दिलाएगी। इनकी मौजूदगी को शिद्दत से महसूस कराएगी।

दरअसल,हरियाणा के भिवानी शहर और उसके आसपास के गांव में मुक्केबाजी के रिंग में उतरना कुछ वैसा ही है,जैसा छोटा नागपुर के इलाके में आदिवासियों के हाथ में हॉकी स्टिक का पहुंचना। या फिर, राजस्थान या झारखंड के आदिवासी अंचल में तीरंदाजी के सहारे समाज में एक मान्यता हासिल करने की कोशिश। छोटा नागपुर में हॉकी के उबड़ खाबड़ मैदानों पर ये अलख जगाने का काम कभी माइकल किंडो की कामयाबी के साथ शुरु हुआ। तो कभी, श्यामलाल मीणा और लिंबाराम के तीरों ने इसे परवान चढ़ाया। भिवानी के हलकों में भी हवा सिंह के एशियाई गोल्ड ने मुक्केबाजी की दस्तक दी। दिलचस्प है कि इन तीनों हिस्सों में ही बेहतर कल के ख्वाब संजोए खिलाड़ियों ने कभी सुविधाओं की बात नहीं की। झारखंड में अगर हॉकी की जगह पेड़ की टूटी डाली से स्टिक बनाकर अपना रास्ता तय करने की कोशिश शुरु हुई तो भिवानी में भी टूटे फूटे शेड के नीचे बॉक्सिंग क्लबों ने शक्ल लेनी शुरु की। नतीजा सामने है- हॉकी में अगर किंडो से शुरु हुआ कारवां डुंगडुंग,टोपनो से होता हुआ दिलीप टिर्की की कप्तानी पर भी थमा नहीं है,तो मुक्केबाजी के रिंग में हवा सिंह के बाद राजकुमार सांगवान की कड़ी से आगे निकलते हुए अखिल कुमार, जितेन्द्र कुमार के बाद अब ये विजेन्द्र की सुनहरी कामयाबी तक आ पहुंचा है। हर मोर्चे पर अपने टेलेंट और जीवट का लोहा मनवाने के बाद देश का खेल सिस्टम उनकी ओर मुखातिब हुआ है।

फिर,अब नए उभरते हुए खिलाड़ियों की तादाद ही नहीं बढ़ रही,उनके हौसलों के साथ खेल को लेकर उनकी सूझबूझ और उनकी स्किल भी नयी उम्मीदें जगा रही है। शायद,तभी तो अखिल,जितेन्द्र से लेकर विजेन्द्र तक सभी मुक्केबाजी के रिंग को शतंरज की बिसात में तब्दील कर डालते हैं। वर्ल्ड चैंपियन को शिकस्त देने वाले अखिल अपने दस्ताने नीचे लटकाकर प्रतिद्दंदी को आक्रमण के लिए ललकारते हैं। दस टांकों के बावजूद जितेन्द्र शुरुआत से ही आक्रमण को आधार बना अपने प्रतिद्दंदी को कोई मौका देना नहीं चाहते। इनसे कुछ हटकर विजेन्द्र अपने साथियों की चूक से सीख लेते हुए मुकाबले को तीसरे राउंड में पहुंचने से पहले ही नतीजे की ओर मोड़ना चाहते हैं। इनके मुक्कों में हवा सिंह और कौर सिंह की ताकत से ज्यादा निगाह होती है-ज्यादा से ज्यादा अंक बटोरने की रणनीति पर। इससे मिलती हर जीत उनके लिए कामयाबी के नए रास्ते खोल रही है।

दोहा एशियाई खेलों में कांस्य पदक और कॉमनवेल्थ में रजत पदक जीतने वाले विजेन्द्र के करियर में भी ओलंपिक चैंपियन बख्तियार,आर्तियेव पर मिली जीत इस सिलसिले की एक कड़ी है। ओलंपिक से पहले चीन ताइपे में आईबीए प्रेसीडेंट कप के दौरान विजेन्द्र ने आर्तियेव को सात के मुकाबले 12 अंकों से हराते हुए वो हौसला और खेल की बारीकियों पर पकड़ जमायी,जिसके बाद रिंग में उतरते हुए एक मनोवैज्ञानिक बढ़त उनके पास रहती है। ये भरोसा देते हुए कि वो दुनिया में किसी को भी फतेह कर सकते हैं।

यही वो पहलू है, जहां से भारतीय खेल एक नयी शुरुआत की ओर मुड़ सकते हैं। अभी तक क्रिकेट के अलावा ज्यादातर खेलों में शिरकत करना एक खिलाड़ी के लिए एक नौकरी और सुरक्षित भविष्य से जुड़ा है। लेकिन,जीत का ये जज्बा ठीक वैसे ही कहानी रच सकता है,जिस तरह इथोपिया के लॉंग डिस्टेंस रनर और जमैका के स्प्रिंटर्स रच रहे हैं। सारी कहानी अपनी ताकत और टेलेंट को पहचान उसे एक सही दिशा देने की है। वैसे,इस देश में अस्सी के दशक में स्पेशल एरिया गेम्स के जरिए ऐसी पहल हुई थी। लेकिन, आदिवासी इलाकों से तीरंदाज से लेकर अंडमान निकोबार से साइकलिंग की प्रतिभाओं को छांटकर उन्हें चैंपियन में तब्दील करने की कोशिशें परवान चढ़ने से पहले ही खत्म हो गई। श्यामलाल मीणा और लिंबाराम जैसे कुछ नाम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर धूमकेतु की तरह चमके और फिर गुमनामी में खो गए।

दरअसल,विजेन्द्र से लेकर सुशील कुमार की कामयाबियों के बीच हमें उस बीते कल से भी सीख लेनी होगी,जिसने दस साल पहले बैंकॉक में डिंको सिंह की सुनहरी कामयाबी के साथ नए सपने जगाए थे। लेकिन, मणिपुर का ये टेलेंटेड मुक्केबाज अपने इस सिलसिले को बैंकॉक से आगे नहीं ले जा पाया। कोशिश ये होनी चाहिए कि ये कामयाबियां एक सिलसिले में तब्दील हो सकें। तभी हम 2020 में ओलंपिक की मेजबानी का दावा पेश करने का नैतिक साहस जुटा सकते हैं। तभी हम, क्रिकेट के जुनून में डूबे इस देश में बाकी खेलों का एक समानान्तर तंत्र खड़ा कर सकते हैं। इसके लिए जरुरी है ठीक वैसे ही शब्द,वैसा ही जज्बा और वैसी ही हुंकार-जैसे रिंग में उतरने से पहले विजेन्द्र ने लगायी-आई एम द बेस्ट।

2 comments:

diery said...

sanjay srivastava said
बेशक हम पहली बार ओल्य्म्पिक मे तीन पदक जीतने को turning point मान सकते हैं. लेकिन ऐसा क्यो है की मुश्कील से ढाई दशक पहले ओल्य्म्पिक मे वापसी करने वाला चाइना अब खेलो की महाशक्ति है. क्या इसलिए क्योकि उसने अपने खेल system को बेहद सुनियोजित तरीके से विकसित किया. आज उसका खेल ढांचा इतना बडा हो चुका है दुनिया के दूसरे देश उसके सामने बौने लगने लगे हैं. केवल china ही क्यो, cuba एक उदाहरण बन चुका है, cuba मे तीन दशक पहले athletics के लिए एक program शुरू किया गया था. इस ओल्य्म्पिक मे उसकी भी ताकत ज़ाहिर हो चुकी है. कहने का मतलब केवल इतना है की क्या इन सबसे हम कुछ सीख सकते हैं. मुझे नही लगता की १०० करोड़ से ज़्यादा की आबादी वाले अपने देश मे talents की कोई कमी है. लेकिन काश हमारे पास कोई ऐसा system हो जो प्रतिभाओं को ना केवल सामने ला सके बल्कि निखार भी पाये. वैसे नरेन्द्र आप बहुत अच्छा लिख रहे हैं....इसे जारी रखिये
sanjay srivastava

vijay gaur/विजय गौड़ said...

उम्मीद जगाते इस आलेख के लिये बहुत बहुत बधाई।